जिनकी बुद्धि उसमें लीन है, जिनका आत्मा वह है, जो उसमें स्थित हैं, जिनका परम लक्ष्य वह है, वे पुनः लौटने की जगह को नहीं जाते, ज्ञान द्वारा उनके पाप धुल गए हैं।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्द अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत
5.17 तद्बुद्धयः बुद्धि उसमें लीन? तदात्मानः उनका आत्मा वह? तन्निष्ठाः उसमें स्थित? तत्परायणाः उसे अपना परम लक्ष्य बना कर? गच्छन्ति जाते हैं? अपुनरावृत्तिम् पुनः लौटना नहीं? ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः जिनके पाप ज्ञान द्वारा धुल गए हैं।व्याख्या वे अपनी बुद्धि को ब्रह्म या परमात्मा पर लगाते हैं। वे महसूस करते हैं और समझते हैं कि ब्रह्म ही उनका आत्मा है। निरंतर और दीर्घकालीन ध्यान के द्वारा वे ब्रह्म में स्थित हो जाते हैं। नाम और रूप का पूरा संसार उनके लिए मिट जाता है। वे केवल ब्रह्म में रहते हैं। उनका एकमात्र परम लक्ष्य और एकमात्र आश्रय ब्रह्म है। वे केवल आत्मा में ही आनंद लेते हैं। वे आत्मा में ही संतुष्ट हैं। वे आत्मा में ही संतुष्ट रहते हैं। ऐसे लोग इस संसार में कभी वापस नहीं आते, क्योंकि उनके पाप ज्ञान (ब्रह्मज्ञान) द्वारा नष्ट हो जाते हैं। (देखें IX.34)
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5.17 तद्बुद्धयः बुद्धि उसमें लीन? तदात्मानः उनका आत्मा वह? तन्निष्ठाः उसमें स्थित? तत्परायणाः उसे अपना परम लक्ष्य बना कर? गच्छन्ति जाते हैं? अपुनरावृत्तिम् पुनः लौटना नहीं? ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः जिनके पाप ज्ञान द्वारा धुल गए हैं।व्याख्या वे अपनी बुद्धि को ब्रह्म या परमात्मा पर लगाते हैं। वे महसूस करते हैं और समझते हैं कि ब्रह्म ही उनका आत्मा है। निरंतर और दीर्घकालीन ध्यान के द्वारा वे ब्रह्म में स्थित हो जाते हैं। नाम और रूप का पूरा संसार उनके लिए मिट जाता है। वे केवल ब्रह्म में रहते हैं। उनका एकमात्र परम लक्ष्य और एकमात्र आश्रय ब्रह्म है। वे केवल आत्मा में ही आनंद लेते हैं। वे आत्मा में ही संतुष्ट हैं। वे आत्मा में ही संतुष्ट रहते हैं। ऐसे लोग इस संसार में कभी वापस नहीं आते, क्योंकि उनके पाप ज्ञान (ब्रह्मज्ञान) द्वारा नष्ट हो जाते हैं। (देखें IX.34)