ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः |
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ||५-१०||
brahmaṇyādhāya karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā karoti yaḥ .
lipyate na sa pāpena padmapatramivāmbhasā ||5-10||
जो व्यक्ति कर्मों को ब्रह्म को अर्पित करते हुए करता है और आसक्ति को त्याग देता है, वह पाप से प्रदूषित नहीं होता, जैसे कमल का पत्ता पानी से प्रदूषित नहीं होता।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दार्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत
5.10 ब्रह्मणि ब्रह्म में? आधाय समर्पित करते हुए? कर्माणि कर्म? सङ्गम् आसक्ति? त्यक्त्वा त्याग कर? करोति करता है? यः जो? लिप्यते प्रदूषित होता है? न नहीं? सः वह? पापेन पाप से? पद्मपत्रम् कमल का पत्ता? इव जैसे? अम्भसा पानी से।व्याख्या अध्याय IV के श्लोक 18? 20? 21? 22? 23? 37? 41 और अध्याय V के श्लोक 10? 11 और 12 सभी इस एक विचार को व्यक्त करते हैं कि जो योगी कार्यों को अहंकार के बिना और परिणामों की आसक्ति के बिना करता है, जिन्हें वह प्रभु को समर्पण मानता है, वह कार्यों (कर्म) से प्रदूषित नहीं होता। वह मोक्ष के लिए भी आसक्त नहीं रहता। वह कर्म में अकर्म देखता है। उसके सभी कर्म ज्ञान की अग्नि में जल जाते हैं। वह संसार के चक्र से बच जाता है। वह जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है। उसे हृदय की पवित्रता प्राप्त होती है और हृदय की पवित्रता के माध्यम से वह आत्मज्ञान प्राप्त करता है। आत्मज्ञान के माध्यम से वह मुक्त हो जाता है। ये उपरोक्त दस श्लोकों का सार है। (Cf.III.30)
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5.10 ब्रह्मणि ब्रह्म में? आधाय समर्पित करते हुए? कर्माणि कर्म? सङ्गम् आसक्ति? त्यक्त्वा त्याग कर? करोति करता है? यः जो? लिप्यते प्रदूषित होता है? न नहीं? सः वह? पापेन पाप से? पद्मपत्रम् कमल का पत्ता? इव जैसे? अम्भसा पानी से।व्याख्या अध्याय IV के श्लोक 18? 20? 21? 22? 23? 37? 41 और अध्याय V के श्लोक 10? 11 और 12 सभी इस एक विचार को व्यक्त करते हैं कि जो योगी कार्यों को अहंकार के बिना और परिणामों की आसक्ति के बिना करता है, जिन्हें वह प्रभु को समर्पण मानता है, वह कार्यों (कर्म) से प्रदूषित नहीं होता। वह मोक्ष के लिए भी आसक्त नहीं रहता। वह कर्म में अकर्म देखता है। उसके सभी कर्म ज्ञान की अग्नि में जल जाते हैं। वह संसार के चक्र से बच जाता है। वह जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है। उसे हृदय की पवित्रता प्राप्त होती है और हृदय की पवित्रता के माध्यम से वह आत्मज्ञान प्राप्त करता है। आत्मज्ञान के माध्यम से वह मुक्त हो जाता है। ये उपरोक्त दस श्लोकों का सार है। (Cf.III.30)