जो मनुष्य श्रद्धा से भरा हुआ है, जो इसके प्रति समर्पित है, और जिसने इंद्रियों को वश में कर लिया है, वह (इस) ज्ञान को प्राप्त करता है; और ज्ञान को प्राप्त करके वह तुरंत ही परम शांति को प्राप्त करता है।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द अर्थ समान स्रोत से हैं। स्रोत
4.39 श्रद्धावान् श्रद्धा से भरा हुआ मनुष्य? लभते प्राप्त करता है? ज्ञानम् ज्ञान? तत्परः समर्पित? संयतेन्द्रियः जिसने इंद्रियों को वश में कर लिया है? ज्ञानम् ज्ञान? लब्ध्वा प्राप्त करके? पराम् परम? शान्तिम् शांति को? अचिरेण तुरंत? अधिगच्छति प्राप्त करता है।व्याख्या जो मनुष्य श्रद्धा से भरा हुआ है? जो निरंतर अपने गुरु की सेवा करता है और उसकी शिक्षाओं को सुनता है? जिसने इंद्रियों को वश में कर लिया है, वह निश्चित रूप से ज्ञान प्राप्त करता है और तुरंत ही परम शांति या मुक्ति (मोक्ष) को प्राप्त करता है। उपरोक्त तीनों योग्यताएं एक साधक के लिए अनिवार्य हैं यदि वह परम शांति को तुरंत प्राप्त करना चाहता है। एकमात्र योग्यता पर्याप्त नहीं होगी। (तुलना करें X.10?11)
इस श्लोक पर आनंद के साथ चिंतन करें
यह श्लोक आपके अंदर क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से लेते हैं और आपके अपने मार्ग का सम्मान करते हैं।
4.39 श्रद्धावान् श्रद्धा से भरा हुआ मनुष्य? लभते प्राप्त करता है? ज्ञानम् ज्ञान? तत्परः समर्पित? संयतेन्द्रियः जिसने इंद्रियों को वश में कर लिया है? ज्ञानम् ज्ञान? लब्ध्वा प्राप्त करके? पराम् परम? शान्तिम् शांति को? अचिरेण तुरंत? अधिगच्छति प्राप्त करता है।व्याख्या जो मनुष्य श्रद्धा से भरा हुआ है? जो निरंतर अपने गुरु की सेवा करता है और उसकी शिक्षाओं को सुनता है? जिसने इंद्रियों को वश में कर लिया है, वह निश्चित रूप से ज्ञान प्राप्त करता है और तुरंत ही परम शांति या मुक्ति (मोक्ष) को प्राप्त करता है। उपरोक्त तीनों योग्यताएं एक साधक के लिए अनिवार्य हैं यदि वह परम शांति को तुरंत प्राप्त करना चाहता है। एकमात्र योग्यता पर्याप्त नहीं होगी। (तुलना करें X.10?11)