इस ज्ञान को जानकर, हे अर्जुन, तुम फिर से इस तरह भ्रमित नहीं होगे; और इसके द्वारा तुम सभी प्राणियों को अपने आत्मन् में और मुझ में भी देखोगे।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत
4.35 यत् कौन? ज्ञात्वा जानकर? न नहीं? पुनः पुनः? मोहम् मोह? एवम् इस प्रकार? यास्यसि होगे? पाण्डव हे पांडव? येन इसके द्वारा? भूतानि प्राणी? अशेषेण सभी? द्रक्ष्यसि देखोगे? आत्मनि अपने आत्मन् में? अथो और? मयि मुझ में।टिप्पणी वह? पिछले श्लोक में उल्लिखित आत्म ज्ञान? जो ब्रह्मनिष्ठ गुरु से प्रणाम, प्रश्न और सेवा के माध्यम से सीखा जाना है। जब आप यह ज्ञान प्राप्त करते हैं तो आप फिर से भ्रम या त्रुटि के अधीन नहीं होंगे। आप उस अंतर्निहित मूल एकता को देखेंगे। आप सीधे अंतर्दृष्टि या अंतरात्मा के अनुभव से जानेंगे कि सृष्टिकर्ता से लेकर घास के एक तिनके तक सभी प्राणी आपके अपने आत्मन् में और मुझ में भी विद्यमान हैं। (cf.IX.15XVIII.20)
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4.35 यत् कौन? ज्ञात्वा जानकर? न नहीं? पुनः पुनः? मोहम् मोह? एवम् इस प्रकार? यास्यसि होगे? पाण्डव हे पांडव? येन इसके द्वारा? भूतानि प्राणी? अशेषेण सभी? द्रक्ष्यसि देखोगे? आत्मनि अपने आत्मन् में? अथो और? मयि मुझ में।टिप्पणी वह? पिछले श्लोक में उल्लिखित आत्म ज्ञान? जो ब्रह्मनिष्ठ गुरु से प्रणाम, प्रश्न और सेवा के माध्यम से सीखा जाना है। जब आप यह ज्ञान प्राप्त करते हैं तो आप फिर से भ्रम या त्रुटि के अधीन नहीं होंगे। आप उस अंतर्निहित मूल एकता को देखेंगे। आप सीधे अंतर्दृष्टि या अंतरात्मा के अनुभव से जानेंगे कि सृष्टिकर्ता से लेकर घास के एक तिनके तक सभी प्राणी आपके अपने आत्मन् में और मुझ में भी विद्यमान हैं। (cf.IX.15XVIII.20)