इस प्रकार जान कर, मुक्ति की खोज करने वाले प्राचीन ऋषियों ने भी कर्म किया है; इसलिए तुम भी कर्म करो, जैसा पूर्वकाल में ऋषियों ने किया था।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत
4.15 एवं इस प्रकार? ज्ञात्वा जान कर? कृतम् किया गया? कर्म कर्म? पूर्वैः प्राचीनों द्वारा? अपि भी? मुमुक्षुभिः मुक्ति के खोजी? कुरु करो? कर्म कर्म? एव ही? तस्मात् इसलिए? त्वम् तुम? पूर्वैः प्राचीनों द्वारा?,पूर्वतरम् प्राचीन काल में? कृतम् किया गया। व्याख्या यह जानकर कि आत्मा को फलों की कोई इच्छा नहीं हो सकती और वह उनसे प्रदूषित नहीं हो सकती, और यह जानकर कि कोई भी अहंकार, आसक्ति और फल की अपेक्षा के बिना काम करे तो प्रदूषित नहीं हो सकता, तुम अपना कर्तव्य पूरा करो। यदि तुम्हारा हृदय अशुद्ध है, तो उसकी शुद्धि के लिए कर्म करो। यदि तुमने आत्मज्ञान या आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर लिया है, तो विश्व के कल्याण के लिए कर्म करो। जनक आदि प्राचीन ऋषियों ने पूर्वकाल में कर्म किए। इसलिए तुम भी कर्म करो।
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4.15 एवं इस प्रकार? ज्ञात्वा जान कर? कृतम् किया गया? कर्म कर्म? पूर्वैः प्राचीनों द्वारा? अपि भी? मुमुक्षुभिः मुक्ति के खोजी? कुरु करो? कर्म कर्म? एव ही? तस्मात् इसलिए? त्वम् तुम? पूर्वैः प्राचीनों द्वारा?,पूर्वतरम् प्राचीन काल में? कृतम् किया गया। व्याख्या यह जानकर कि आत्मा को फलों की कोई इच्छा नहीं हो सकती और वह उनसे प्रदूषित नहीं हो सकती, और यह जानकर कि कोई भी अहंकार, आसक्ति और फल की अपेक्षा के बिना काम करे तो प्रदूषित नहीं हो सकता, तुम अपना कर्तव्य पूरा करो। यदि तुम्हारा हृदय अशुद्ध है, तो उसकी शुद्धि के लिए कर्म करो। यदि तुमने आत्मज्ञान या आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर लिया है, तो विश्व के कल्याण के लिए कर्म करो। जनक आदि प्राचीन ऋषियों ने पूर्वकाल में कर्म किए। इसलिए तुम भी कर्म करो।