चातुर्वर्ण्य (चार वर्णों) को मेरे द्वारा गुण और कर्म के विभाजन के अनुसार सृष्ट किया गया है; यद्यपि मैं उसका कर्ता हूं तो भी मुझे अकर्ता और अव्यय जानो।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्द अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत
4.13 चातुर्वर्ण्यम् चार वर्ण? मया मेरे द्वारा? सृष्टम् सृष्ट किया गया है? गुणकर्मविभागशः गुण और कर्म के विभाजन के अनुसार? तस्य उसका? कर्तारम् कर्ता? अपि भी? माम् मुझे? विद्धि जानो? अकर्तारम् अकर्ता? अव्ययम् अव्यय।टिप्पणी चार वर्ण (ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य और शूद्र) गुण और कर्म के विभाजन के अनुसार वर्गीकृत किए गए हैं। एक ब्राह्मण में सत्व प्रधान होता है। उसमें आत्मसंयम? पवित्रता? शांति? सरलता? भक्ति आदि होते हैं। एक क्षत्रिय में रजस प्रधान होता है। उसमें पराक्रम? तेज? दृढ़ता? कौशल? उदारता और शासक स्वभाव होता है। एक वैश्य में रजस प्रधान होता है और तमस रजस के अधीन होता है। वह कृषि? पशुओं की रक्षा और व्यापार का कार्य करता है। एक शूद्र में तमस प्रधान होता है और रजस तमस के अधीन होता है। वह अन्य तीन वर्णों की सेवा करता है। मानव स्वभाव और प्रवृत्तियां गुणों के अनुसार भिन्न होती हैं। यद्यपि भगवान वर्ण व्यवस्था के कर्ता हैं? तो भी वह कर्ता नहीं हैं क्योंकि वह अकर्ता हैं। वह संसार के अधीन नहीं हैं। वास्तव में माया सब कुछ करती है। माया ही वास्तविक कर्ता है। यदि चार वर्ण अपने कर्तव्यों का सुचारु रूप से पालन करें तो समाज समृद्ध हो सकता है। अन्यथा अराजकता? विभाजन और संघर्ष होगा। (देखें XVIII.41)।
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4.13 चातुर्वर्ण्यम् चार वर्ण? मया मेरे द्वारा? सृष्टम् सृष्ट किया गया है? गुणकर्मविभागशः गुण और कर्म के विभाजन के अनुसार? तस्य उसका? कर्तारम् कर्ता? अपि भी? माम् मुझे? विद्धि जानो? अकर्तारम् अकर्ता? अव्ययम् अव्यय।टिप्पणी चार वर्ण (ब्राह्मण? क्षत्रिय? वैश्य और शूद्र) गुण और कर्म के विभाजन के अनुसार वर्गीकृत किए गए हैं। एक ब्राह्मण में सत्व प्रधान होता है। उसमें आत्मसंयम? पवित्रता? शांति? सरलता? भक्ति आदि होते हैं। एक क्षत्रिय में रजस प्रधान होता है। उसमें पराक्रम? तेज? दृढ़ता? कौशल? उदारता और शासक स्वभाव होता है। एक वैश्य में रजस प्रधान होता है और तमस रजस के अधीन होता है। वह कृषि? पशुओं की रक्षा और व्यापार का कार्य करता है। एक शूद्र में तमस प्रधान होता है और रजस तमस के अधीन होता है। वह अन्य तीन वर्णों की सेवा करता है। मानव स्वभाव और प्रवृत्तियां गुणों के अनुसार भिन्न होती हैं। यद्यपि भगवान वर्ण व्यवस्था के कर्ता हैं? तो भी वह कर्ता नहीं हैं क्योंकि वह अकर्ता हैं। वह संसार के अधीन नहीं हैं। वास्तव में माया सब कुछ करती है। माया ही वास्तविक कर्ता है। यदि चार वर्ण अपने कर्तव्यों का सुचारु रूप से पालन करें तो समाज समृद्ध हो सकता है। अन्यथा अराजकता? विभाजन और संघर्ष होगा। (देखें XVIII.41)।