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भगवद गीता 4.1

श्रीभगवानुवाच | इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् | विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ||४-१||
śrībhagavānuvāca . imaṃ vivasvate yogaṃ proktavānahamavyayam . vivasvānmanave prāha manurikṣvākave.abravīt ||4-1||
श्रीभगवान ने कहा: मैंने यह अविनाशी योग विवस्वान को सिखाया; विवस्वान ने इसे मनु को बताया; मनु ने इक्ष्वाकु को सुनाया।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत

4.1 इमम् यह? विवस्वते विवस्वान को? योगम् योग? प्रोक्तवान् सिखाया? अहम् मैं? अव्ययम् अविनाशी? विवस्वान् विवस्वान? मनवे मनु को? प्राह सिखाया? मनुः मनु? इक्ष्वाकवे इक्ष्वाकु को? अब्रवीत् सुनाया। व्याख्या विवस्वान का अर्थ सूर्य है। इक्ष्वाकु मनु के पुत्र थे। इक्ष्वाकु क्षत्रियों के सौर वंश के प्रसिद्ध पूर्वज थे। यह योग अविनाशी कहा जाता है क्योंकि इसके माध्यम से प्राप्त परिणाम या फल, अर्थात् मोक्ष, अविनाशी है। यदि राज्यों के शासक पिछले दो प्रवचनों में मुझ द्वारा सिखाए गए योग का ज्ञान रखते हैं, तो वे ब्राह्मणों की रक्षा कर सकते हैं और न्याय के साथ अपने राज्य पर शासन कर सकते हैं। इसलिए मैंने विकास के आरंभ में इस योग को सूर्यदेव को सिखाया।

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