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भगवद्गीता 3.6

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् | इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ||३-६||
karmendriyāṇi saṃyamya ya āste manasā smaran . indriyārthānvimūḍhātmā mithyācāraḥ sa ucyate ||3-6||
जो व्यक्ति कर्मेंद्रियों को संयमित करके मन से इंद्रियों के विषयों का चिंतन करता है, वह भ्रमित बुद्धि वाला और छद्म आचरण करने वाला कहा जाता है।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द अर्थ उसी स्रोत से। स्रोत

3.6 कर्मेन्द्रियाणि कर्मेंद्रियां (कर्म की इंद्रियां)? संयम्य दबाना? यः जो? आस्ते बैठता है? मनसा मन से? स्मरन् याद करते हुए? इन्द्रियार्थान् इंद्रियों के विषय? विमूढात्मा भ्रमित आत्मा वाला? मिथ्याचारः कपटाचारी? सः वह? उच्यते कहा जाता है।टिप्पणी पाँच कर्मेंद्रियां? कर्म इंद्रियां? हैं वाक् (वाणी की इंद्रिय)? पाणि (हाथ)? पदम् (पैर)? उपस्थ (जननांग) और गुदम् (मलद्वार)। ये पाँच तन्मात्राओं? सूक्ष्म तत्वों के राजसिक भाग से उत्पन्न होती हैं - वाक् आकाश तन्मात्रा से? पाणि वायु तन्मात्रा से? पदम् अग्नि तन्मात्रा से? उपस्थ जल तन्मात्रा से? और गुदम् पृथ्वी तन्मात्रा से। जो मनुष्य कर्मेंद्रियों को दबाकर अपने मन में इंद्रियों के विषयों के विचार करता है, वह पापी आचरण करने वाला है। वह स्वयं को धोखा देता है। वह सच्चा पाखंडी है।कर्मेंद्रियों पर नियंत्रण होना चाहिए। विचारों पर भी नियंत्रण होना चाहिए। मन को भगवान पर दृढ़ता से लगाया जाना चाहिए। तभी आप एक सच्चे योगी बनेंगे। तभी आप आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करेंगे।

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