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भगवद्गीता 3.4

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते | न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ||३-४||
na karmaṇāmanārambhānnaiṣkarmyaṃ puruṣo.aśnute . na ca saṃnyasanādeva siddhiṃ samadhigacchati ||3-4||
कर्मों का न करना करने वाला व्यक्ति कर्मरहितता को प्राप्त नहीं करता; न ही केवल संन्यास से ही वह सिद्धि को प्राप्त होता है।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्द अर्थ एक ही स्रोत से। स्रोत

3.4 न नहीं? कर्मणाम् कर्मों का? अनारम्भात् न करने से? नैष्कर्म्यम् कर्मरहितता? पुरुषः व्यक्ति? अश्नुते प्राप्त होता है? न नहीं? च और? संन्यसनात् संन्यास से? एव ही? सिद्धिम् सिद्धि? समधिगच्छति प्राप्त करता है।व्याख्या कर्मरहितता (नैष्कर्म्यम्) और सिद्धि (सिद्धि) पर्यायवाची हैं। जो ऋषि सिद्धि को प्राप्त हुआ है या कर्मरहितता की अवस्था को पहुँचा है वह अपने आवश्यक स्वरूप सत्-चित्-आनंद (सच्चिदानंद स्वरूप) में विश्राम करता है। उसे किसी साध्य के लिए कर्म की न तो आवश्यकता है और न ही इच्छा है। उसे आत्मा में पूर्ण संतुष्टि है।आत्मज्ञान प्राप्त करके ही व्यक्ति कर्मरहितता की अवस्था को प्राप्त होता है। यदि कोई व्यक्ति केवल कर्मों को त्याग कर बैठा रहे तो यह नहीं कहा जा सकता कि वह कर्मरहितता की अवस्था को प्राप्त हुआ है। उसका मन योजना बनाता रहेगा, साजिशें करेगा और विचार करेगा। विचार वास्तविक कर्म है। वह ऋषि जो सकारात्मक विचारों, इच्छाओं और पसंद-नापसंद से मुक्त है, जिसे आत्मज्ञान है, कह सकता है कि उसने कर्मरहितता की अवस्था को प्राप्त किया है।कोई भी व्यक्ति केवल संन्यास द्वारा या बिना आत्मज्ञान के कर्मों को त्याग कर सिद्धि या कर्मरहितता को प्राप्त नहीं कर सकता। (cf.XVIII.49)।

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