इंद्रियों के विषयों के प्रति आसक्ति और विरक्ति इंद्रियों में स्थित हैं; इनके वश में न आएँ; क्योंकि ये उसके शत्रु हैं।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्द अर्थ उसी स्रोत से। स्रोत
3.34 इन्द्रियस्य प्रत्येक इंद्रिय का? अर्थे विषय में? रागद्वेषौ आसक्ति और विरक्ति? व्यवस्थितौ स्थित? तयोः इन दोनों का? न नहीं? वशम् वश में? आगच्छेत् आना चाहिए? तौ ये दोनों? हि वास्तव में? अस्य उसके? परिपन्थिनौ शत्रु।टिप्पणी प्रत्येक इंद्रिय के लिए सुखद वस्तु के प्रति आकर्षण और अप्रिय वस्तु के प्रति विरक्ति होती है। यदि कोई इन दोनों धाराओं को नियंत्रित कर सकता है? अर्थात्? आसक्ति और विरक्ति को? तो वह इन दोनों धाराओं के वश में नहीं आएगा। यहाँ व्यक्तिगत प्रयास या पुरुषार्थ की गुंजाइश है। प्रकृति जो किसी के संस्कारों या अतीत के कर्मों के गुण और अगुण के सुप्त स्वयंजन्य संस्कारों का समष्टि है? मनुष्य को आसक्ति और विरक्ति की इन दोनों धाराओं के माध्यम से अपने पथ की ओर खींचती है। यदि कोई इन दोनों धाराओं को नियंत्रित कर सकता है? यदि वह विवेक और विचार या सही अनुसंधान के माध्यम से प्रेम और घृणा के वश से ऊपर उठ सकता है? तो वह प्रकृति को जीत सकता है और अमरता और शाश्वत आनंद प्राप्त कर सकता है। वह अब अपनी स्वयं की प्रकृति के अधीन नहीं रहेगा। व्यक्ति को हमेशा इंद्रियों के विषयों के प्रति आसक्ति और विरक्ति से स्वयं को मुक्त करने का प्रयास करना चाहिए।
इस श्लोक पर Ananda के साथ चिंतन करें
यह श्लोक आपके भीतर क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — Ananda कई परंपराओं से प्रेरणा लेता है और आपके अपने पथ को सम्मान देता है।
3.34 इन्द्रियस्य प्रत्येक इंद्रिय का? अर्थे विषय में? रागद्वेषौ आसक्ति और विरक्ति? व्यवस्थितौ स्थित? तयोः इन दोनों का? न नहीं? वशम् वश में? आगच्छेत् आना चाहिए? तौ ये दोनों? हि वास्तव में? अस्य उसके? परिपन्थिनौ शत्रु।टिप्पणी प्रत्येक इंद्रिय के लिए सुखद वस्तु के प्रति आकर्षण और अप्रिय वस्तु के प्रति विरक्ति होती है। यदि कोई इन दोनों धाराओं को नियंत्रित कर सकता है? अर्थात्? आसक्ति और विरक्ति को? तो वह इन दोनों धाराओं के वश में नहीं आएगा। यहाँ व्यक्तिगत प्रयास या पुरुषार्थ की गुंजाइश है। प्रकृति जो किसी के संस्कारों या अतीत के कर्मों के गुण और अगुण के सुप्त स्वयंजन्य संस्कारों का समष्टि है? मनुष्य को आसक्ति और विरक्ति की इन दोनों धाराओं के माध्यम से अपने पथ की ओर खींचती है। यदि कोई इन दोनों धाराओं को नियंत्रित कर सकता है? यदि वह विवेक और विचार या सही अनुसंधान के माध्यम से प्रेम और घृणा के वश से ऊपर उठ सकता है? तो वह प्रकृति को जीत सकता है और अमरता और शाश्वत आनंद प्राप्त कर सकता है। वह अब अपनी स्वयं की प्रकृति के अधीन नहीं रहेगा। व्यक्ति को हमेशा इंद्रियों के विषयों के प्रति आसक्ति और विरक्ति से स्वयं को मुक्त करने का प्रयास करना चाहिए।