एक बुद्धिमान व्यक्ति भी अपनी प्रकृति के अनुसार कार्य करता है; प्राणी प्रकृति का पालन करते हैं; संयम क्या कर सकता है?
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्द अर्थ वही स्रोत से हैं। स्रोत
3.33 सदृशम् अनुसार? चेष्टते कार्य करता है? स्वस्याः अपनी? प्रकृतेः प्रकृति के? ज्ञानवान् बुद्धिमान? अपि भी? प्रकृतिम् प्रकृति को? यान्ति जाते हैं? भूतानि प्राणी? निग्रहः संयम? किम् क्या? करिष्यति कर सकता है।टिप्पणी जो इस श्लोक को पढ़ेगा वह इस निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि मनुष्य के व्यक्तिगत प्रयास के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। ऐसा नहीं है। अगला श्लोक पढ़ें। यह स्पष्ट रूप से संकेत देता है कि यदि मनुष्य राग-द्वेष (प्रेम और घृणा) के प्रभाव से ऊपर उठे तो प्रकृति को जीत सकता है। आवेगी और अज्ञानी व्यक्ति ही अपनी प्राकृतिक प्रवृत्तियों के प्रभाव में आता है? और उसकी निम्न प्रकृति उसे नियंत्रित करती है। वह इंद्रियों और पसंद-नापसंद की दोनों धाराओं पर कोई संयम नहीं रख सकता। जो साधक सत्य की खोज में है जो चार साधनों से संपन्न है? और जो निरंतर ध्यान का अभ्यास करता है वह आसानी से प्रकृति को नियंत्रित कर सकता है। (cf.II.60V.14XVIII.59)।
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3.33 सदृशम् अनुसार? चेष्टते कार्य करता है? स्वस्याः अपनी? प्रकृतेः प्रकृति के? ज्ञानवान् बुद्धिमान? अपि भी? प्रकृतिम् प्रकृति को? यान्ति जाते हैं? भूतानि प्राणी? निग्रहः संयम? किम् क्या? करिष्यति कर सकता है।टिप्पणी जो इस श्लोक को पढ़ेगा वह इस निष्कर्ष पर पहुंचेगा कि मनुष्य के व्यक्तिगत प्रयास के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। ऐसा नहीं है। अगला श्लोक पढ़ें। यह स्पष्ट रूप से संकेत देता है कि यदि मनुष्य राग-द्वेष (प्रेम और घृणा) के प्रभाव से ऊपर उठे तो प्रकृति को जीत सकता है। आवेगी और अज्ञानी व्यक्ति ही अपनी प्राकृतिक प्रवृत्तियों के प्रभाव में आता है? और उसकी निम्न प्रकृति उसे नियंत्रित करती है। वह इंद्रियों और पसंद-नापसंद की दोनों धाराओं पर कोई संयम नहीं रख सकता। जो साधक सत्य की खोज में है जो चार साधनों से संपन्न है? और जो निरंतर ध्यान का अभ्यास करता है वह आसानी से प्रकृति को नियंत्रित कर सकता है। (cf.II.60V.14XVIII.59)।