प्रकृति के गुण ही सभी कर्मों को सब प्रकार से करते हैं। जिसका आत्मा अहंकार से मोहित है, वह सोचता है, "मैं कर्ता हूँ।"
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत
3.27 प्रकृतेः प्रकृति का? क्रियमाणानि किए जाते हैं? गुणैः गुणों द्वारा? कर्माणि कर्म? सर्वशः सभी स्थितियों में? अहङ्कारविमूढात्मा जिसका मन अहंकार से मोहित है? कर्ता कर्ता? अहम् मैं? इति इस प्रकार? मन्यते सोचता है। व्याख्या प्रकृति या प्रधान या प्रकृति वह अवस्था है जिसमें तीनों गुण - सत्त्व, रज और तम - संतुलन की स्थिति में विद्यमान हैं। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो सृष्टि शुरू होती है - शरीर, इंद्रियाँ, मन आदि का निर्माण होता है। जो मनुष्य अहंकार से मोहित है, वह आत्मा को शरीर, मन, जीवन शक्ति और इंद्रियों के साथ जोड़ लेता है और शरीर तथा इंद्रियों के सभी गुणों को आत्मा के लिए मान लेता है। इसलिए वह अज्ञान के कारण सोचता है, मैं कर्ता हूँ। वास्तव में प्रकृति के गुण ही सभी कर्मों को करते हैं। (देखें III.29, V.9, IX.9,10, XIII.21-24,30,32, XVIII.13-14)।
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3.27 प्रकृतेः प्रकृति का? क्रियमाणानि किए जाते हैं? गुणैः गुणों द्वारा? कर्माणि कर्म? सर्वशः सभी स्थितियों में? अहङ्कारविमूढात्मा जिसका मन अहंकार से मोहित है? कर्ता कर्ता? अहम् मैं? इति इस प्रकार? मन्यते सोचता है। व्याख्या प्रकृति या प्रधान या प्रकृति वह अवस्था है जिसमें तीनों गुण - सत्त्व, रज और तम - संतुलन की स्थिति में विद्यमान हैं। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो सृष्टि शुरू होती है - शरीर, इंद्रियाँ, मन आदि का निर्माण होता है। जो मनुष्य अहंकार से मोहित है, वह आत्मा को शरीर, मन, जीवन शक्ति और इंद्रियों के साथ जोड़ लेता है और शरीर तथा इंद्रियों के सभी गुणों को आत्मा के लिए मान लेता है। इसलिए वह अज्ञान के कारण सोचता है, मैं कर्ता हूँ। वास्तव में प्रकृति के गुण ही सभी कर्मों को करते हैं। (देखें III.29, V.9, IX.9,10, XIII.21-24,30,32, XVIII.13-14)।