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भगवद्गीता 3.25

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत | कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ||३-२५||
saktāḥ karmaṇyavidvāṃso yathā kurvanti bhārata . kuryādvidvāṃstathāsaktaścikīrṣurlokasaṃgraham ||3-25||
जैसे अज्ञानी लोग कर्म में आसक्त होकर कार्य करते हैं, हे भारत (अर्जुन), वैसे ही ज्ञानी को बिना आसक्ति के, विश्व के कल्याण की कामना करते हुए कार्य करना चाहिए।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत

3.25 सक्ताः आसक्त? कर्मणि कर्म में? अविद्वांसः अज्ञानी? यथा जैसे? कुर्वन्ति करते हैं? भारत हे भारत? कुर्यात् करना चाहिए? विद्वान् ज्ञानी? तथा वैसे? असक्तः निर्लिप्त? चिकीर्षुः कामना करते हुए? लोकसंग्रहम् विश्व का कल्याण।टिप्पणी अज्ञानी व्यक्ति फल की आशा करते हुए कार्य करता है। वह कहता है, मैं ऐसा-ऐसा काम करूँगा और मुझे ऐसा-ऐसा फल मिलेगा। लेकिन ज्ञानी, जो आत्मा को जानता है, अपने हित के लिए सेवा नहीं करता। उसे ऐसा कार्य करना चाहिए कि संसार उसके उदाहरण का अनुसरण करके शांति, सामंजस्य, हृदय की पवित्रता, दिव्य प्रकाश और ज्ञान प्राप्त करे। ज्ञानी वह है जो आत्मा को जानता है। (cf.II.64III.19XVIII.49)।

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