उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् |
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ||३-२४||
utsīdeyurime lokā na kuryāṃ karma cedaham .
saṅkarasya ca kartā syāmupahanyāmimāḥ prajāḥ ||3-24||
यदि मैं कर्म न करूँ तो ये लोक नष्ट हो जाएँ; मैं वर्णों के संमिश्रण का कारण बनूँ और इन प्राणियों का संहार करूँ।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · शब्द अर्थ नीचे एक ही स्रोत से। स्रोत
3.24 उत्सीदेयुः नष्ट हो जाएँ? इमे ये? लोकाः लोक? न नहीं? कुर्याम् करूँ? कर्म कर्म? चेत् यदि? अहम् मैं? सङ्करस्य संमिश्रण का? च और? कर्ता कारण? स्याम् बनूँ? उपहन्याम् संहार करूँ? इमाः इन? प्रजाः प्राणियों।टिप्पणी यदि मैं कर्म में संलग्न न रहूँ, तो लोग भी निष्क्रिय रहेंगे। वे अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करेंगे। इसलिए वर्णों का संमिश्रण होगा। मुझे इन प्राणियों का संहार करना पड़ेगा।
इस श्लोक पर आनंद के साथ ध्यान करें
यह श्लोक आपके भीतर क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से खींचते हैं और आपके अपने पथ को सम्मान देते हैं।
3.24 उत्सीदेयुः नष्ट हो जाएँ? इमे ये? लोकाः लोक? न नहीं? कुर्याम् करूँ? कर्म कर्म? चेत् यदि? अहम् मैं? सङ्करस्य संमिश्रण का? च और? कर्ता कारण? स्याम् बनूँ? उपहन्याम् संहार करूँ? इमाः इन? प्रजाः प्राणियों।टिप्पणी यदि मैं कर्म में संलग्न न रहूँ, तो लोग भी निष्क्रिय रहेंगे। वे अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करेंगे। इसलिए वर्णों का संमिश्रण होगा। मुझे इन प्राणियों का संहार करना पड़ेगा।