कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः |
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ||३-२०||
karmaṇaiva hi saṃsiddhimāsthitā janakādayaḥ .
lokasaṃgrahamevāpi sampaśyankartumarhasi ||3-20||
जनक और अन्य लोग केवल कर्म द्वारा ही सिद्धि को प्राप्त हुए; जनता की सुरक्षा के लिए भी तुम्हें कर्म करना चाहिए।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत
3.20 कर्मणा कर्म द्वारा? एव केवल? हि वास्तव में? संसिद्धिम् पूर्णता? आस्थिताः प्राप्त? जनकादयः जनक और अन्य? लोकसंग्रहम् जनता की सुरक्षा? एवापि केवल? संपश्यन् ध्यान में रखते हुए? कर्तुम् करने के लिए? अर्हसि तुम्हें करना चाहिए। टिप्पणी संसिद्धि मोक्ष (पूर्णता या मुक्ति) है। जनक (अश्वपति) और अन्य लोगों को आत्म-ज्ञान की पूर्ण जानकारी थी, और फिर भी वे जनता को उदाहरण स्थापित करने के लिए कर्म करते थे। वे मनुष्यों के मार्गदर्शन के लिए काम करते थे।
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3.20 कर्मणा कर्म द्वारा? एव केवल? हि वास्तव में? संसिद्धिम् पूर्णता? आस्थिताः प्राप्त? जनकादयः जनक और अन्य? लोकसंग्रहम् जनता की सुरक्षा? एवापि केवल? संपश्यन् ध्यान में रखते हुए? कर्तुम् करने के लिए? अर्हसि तुम्हें करना चाहिए। टिप्पणी संसिद्धि मोक्ष (पूर्णता या मुक्ति) है। जनक (अश्वपति) और अन्य लोगों को आत्म-ज्ञान की पूर्ण जानकारी थी, और फिर भी वे जनता को उदाहरण स्थापित करने के लिए कर्म करते थे। वे मनुष्यों के मार्गदर्शन के लिए काम करते थे।