जो यहाँ इस तरह स्थापित चक्र का अनुसरण नहीं करता, जो पापी जीवन जीता है, इंद्रियों में आनंदित रहता है, वह व्यर्थ जीवन जीता है, हे अर्जुन।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत
3.16 एवम् इस प्रकार? प्रवर्तितम् स्थापित? चक्रम् चक्र? न नहीं? अनुवर्तयति अनुसरण करता है? इह यहाँ? यः जो? अघायुः पापी जीवन? इन्द्रियारामः इंद्रियों में आनंदित? मोघम् व्यर्थ? पार्थ हे पार्थ? सः वह? जीवति जीता है।टिप्पणी यह निर्माता द्वारा वेद और यज्ञ के आधार पर स्थापित कर्म का चक्र है।जो वेद का अध्ययन न करके और निर्धारित यज्ञ का पालन न करके केवल इंद्रिय सुखों में लिप्त रहता है वह व्यर्थ जीवन जीता है। वह अपना जीवन बर्बाद कर रहा है। वह सचमुच एक निरर्थक जीवन जी रहा है।जो इस नियम के अनुसार नहीं जीता है और जो स्वार्थी है वह पाप करता है। वह निर्माता के नियम का उल्लंघन करता है और यह सबसे बड़ा पाप है।
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3.16 एवम् इस प्रकार? प्रवर्तितम् स्थापित? चक्रम् चक्र? न नहीं? अनुवर्तयति अनुसरण करता है? इह यहाँ? यः जो? अघायुः पापी जीवन? इन्द्रियारामः इंद्रियों में आनंदित? मोघम् व्यर्थ? पार्थ हे पार्थ? सः वह? जीवति जीता है।टिप्पणी यह निर्माता द्वारा वेद और यज्ञ के आधार पर स्थापित कर्म का चक्र है।जो वेद का अध्ययन न करके और निर्धारित यज्ञ का पालन न करके केवल इंद्रिय सुखों में लिप्त रहता है वह व्यर्थ जीवन जीता है। वह अपना जीवन बर्बाद कर रहा है। वह सचमुच एक निरर्थक जीवन जी रहा है।जो इस नियम के अनुसार नहीं जीता है और जो स्वार्थी है वह पाप करता है। वह निर्माता के नियम का उल्लंघन करता है और यह सबसे बड़ा पाप है।