विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः |
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ||२-७१||
vihāya kāmānyaḥ sarvānpumāṃścarati niḥspṛhaḥ .
nirmamo nirahaṅkāraḥ sa śāntimadhigacchati ||2-71||
वह मनुष्य शांति प्राप्त करता है जो सभी इच्छाओं को त्यागकर लालसा रहित, मेरेपन की भावना से रहित और अहंकार से रहित होकर विचरण करता है।
हिंदी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द अर्थ समान स्रोत से हैं। स्रोत
2.71 विहाय त्यागकर? कामान् इच्छाएं? यः जो? सर्वान् सभी? पुमान् मनुष्य? चरति विचरण करता है? निःस्पृहः लालसा से मुक्त? निर्ममः मेरेपन से रहित? निरहंकारः अहंकार से मुक्त? सः वह? शान्तिम् शांति को? अधिगच्छति प्राप्त करता है। व्याख्या जो मनुष्य लालसा से विहीन होकर जीता है, सभी इच्छाओं का त्याग करके, 'मैं' और 'मेरा' की भावना से रहित होकर, जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं पर संतुष्ट रहता है, यहां तक कि उन मूलभूत आवश्यकताओं के लिए भी कोई आसक्ति नहीं रखता है, वह मोक्ष या शाश्वत शांति प्राप्त करता है। (देखें II.55)।
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2.71 विहाय त्यागकर? कामान् इच्छाएं? यः जो? सर्वान् सभी? पुमान् मनुष्य? चरति विचरण करता है? निःस्पृहः लालसा से मुक्त? निर्ममः मेरेपन से रहित? निरहंकारः अहंकार से मुक्त? सः वह? शान्तिम् शांति को? अधिगच्छति प्राप्त करता है। व्याख्या जो मनुष्य लालसा से विहीन होकर जीता है, सभी इच्छाओं का त्याग करके, 'मैं' और 'मेरा' की भावना से रहित होकर, जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं पर संतुष्ट रहता है, यहां तक कि उन मूलभूत आवश्यकताओं के लिए भी कोई आसक्ति नहीं रखता है, वह मोक्ष या शाश्वत शांति प्राप्त करता है। (देखें II.55)।