बेहतर अनुभव के लिए One Source Sangha इंस्टॉल करें

भगवद गीता 2.60

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः | इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ||२-६०||
yatato hyapi kaunteya puruṣasya vipaścitaḥ . indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṃ manaḥ ||2-60||
हे अर्जुन, चंचल इंद्रियां, हालांकि वह प्रयत्नशील हो, एक बुद्धिमान पुरुष के मन को हिंसक रूप से हर ले जाती हैं।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्द अर्थ एक ही स्रोत से। स्रोत

2.60 यततः प्रयत्नशील का? हि निश्चित रूप से? अपि भी? कौन्तेय हे कौंतेय (कुंती के पुत्र)? पुरुषस्य मनुष्य का? विपश्चितः (का) बुद्धिमान? इन्द्रियाणि इंद्रियां? प्रमाथीनि चंचल? हरन्ति ले जाती हैं? प्रसभम् हिंसक रूप से? मनः मन।टिप्पणी साधक को सबसे पहले इंद्रियों को अपने नियंत्रण में लाना चाहिए। इंद्रियां घोड़ों के समान हैं। यदि आप घोड़ों को अपने पूर्ण नियंत्रण में रखते हैं तो आप अपने गंतव्य तक सुरक्षित पहुंच सकते हैं। चंचल घोड़े आपको रास्ते में गिरा देंगे। इसी प्रकार चंचल इंद्रियां आपको इंद्रियों के विषयों में डाल देंगी और आप अपने आध्यात्मिक गंतव्य तक नहीं पहुंच सकते? अर्थात्? परं धाम (परम निवास) या शाश्वत शांति और अमरता का निवास या मोक्ष (अंतिम मुक्ति)। (cf.III.33V.14)।

इस श्लोक पर Ananda के साथ विचार करें

यह श्लोक आपके मन में क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — Ananda कई परंपराओं से ज्ञान लेता है और आपके अपने पथ का सम्मान करता है।

हमारे साथ चलें

एक पाठ, एक प्रश्न, हर रविवार। कुछ और नहीं, कभी नहीं।

🌐 English  ·  हिन्दी