जब यह साधक कछुए की तरह चारों ओर से अपनी इंद्रियों को विषयों से हटाता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द अर्थ समान स्रोत से हैं। स्रोत
2.58 यदा जब? संहरते हटाता है? च और? अयम् यह (योगी)? कूर्मः कछुआ? अङ्गानि अंग? इव जैसे? सर्वशः सभी ओर से? इन्द्रियाणि इंद्रियां? इन्द्रियार्थेभ्यः इंद्रिय विषयों से? तस्य उसकी? प्रज्ञा बुद्धि? प्रतिष्ठिता स्थिर होती है।टिप्पणी इंद्रियों की निवृत्ति को प्रत्याहार या अंतर्मुखीकरण कहते हैं। मन को बाहरी विषयों की ओर दौड़ने की प्राकृतिक प्रवृत्ति है। योगी बार-बार मन को इंद्रियों के विषयों से हटाता है और उसे आत्मा में स्थिर करता है। प्रत्याहार की शक्ति से युक्त योगी भीड़-भाड़ वाली जगह में भी पलक झपकते ही अपनी इंद्रियों को हटाकर समाधि में प्रवेश कर सकता है। वह किसी भी प्रकार की शोरगुल और कोलाहल से विचलित नहीं होता। यहां तक कि युद्ध के मैदान में भी वह अपनी इंद्रियों को हटाकर आत्मा में निवास कर सकता है। प्रत्याहार का अभ्यास करने वाला संसार के लिए मर जाता है। वह बाहरी कंपन्नों से प्रभावित नहीं होता। किसी भी समय मात्र संकल्प से वह अपनी इंद्रियों को पूर्ण नियंत्रण में ला सकता है। वे उसके आज्ञाकारी सेवक या साधन हैं।
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यह श्लोक आपके मन में क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से ज्ञान लेते हैं और आपके अपने मार्ग का सम्मान करते हैं।
2.58 यदा जब? संहरते हटाता है? च और? अयम् यह (योगी)? कूर्मः कछुआ? अङ्गानि अंग? इव जैसे? सर्वशः सभी ओर से? इन्द्रियाणि इंद्रियां? इन्द्रियार्थेभ्यः इंद्रिय विषयों से? तस्य उसकी? प्रज्ञा बुद्धि? प्रतिष्ठिता स्थिर होती है।टिप्पणी इंद्रियों की निवृत्ति को प्रत्याहार या अंतर्मुखीकरण कहते हैं। मन को बाहरी विषयों की ओर दौड़ने की प्राकृतिक प्रवृत्ति है। योगी बार-बार मन को इंद्रियों के विषयों से हटाता है और उसे आत्मा में स्थिर करता है। प्रत्याहार की शक्ति से युक्त योगी भीड़-भाड़ वाली जगह में भी पलक झपकते ही अपनी इंद्रियों को हटाकर समाधि में प्रवेश कर सकता है। वह किसी भी प्रकार की शोरगुल और कोलाहल से विचलित नहीं होता। यहां तक कि युद्ध के मैदान में भी वह अपनी इंद्रियों को हटाकर आत्मा में निवास कर सकता है। प्रत्याहार का अभ्यास करने वाला संसार के लिए मर जाता है। वह बाहरी कंपन्नों से प्रभावित नहीं होता। किसी भी समय मात्र संकल्प से वह अपनी इंद्रियों को पूर्ण नियंत्रण में ला सकता है। वे उसके आज्ञाकारी सेवक या साधन हैं।