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भगवद्गीता 2.56

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः | वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ||२-५६||
duḥkheṣvanudvignamanāḥ sukheṣu vigataspṛhaḥ . vītarāgabhayakrodhaḥ sthitadhīrmunirucyate ||2-56||
वह जिसका मन विपत्ति से विचलित नहीं होता, जो सुखों के लिए लालायित नहीं होता, और जो आसक्ति, भय और क्रोध से मुक्त है, उसे स्थिर बुद्धि वाला ऋषि कहा जाता है।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत

2.56 दुःखेषु विपत्ति में? अनुद्विग्नमनाः अविचलित मन का? सुखेषु सुख में? विगतस्पृहः लालसा रहित? वीतरागभयक्रोधः आसक्ति से मुक्त? भय और क्रोध से? स्थितधीः स्थिर बुद्धि का? मुनिः ऋषि? उच्यते (वह) कहा जाता है।टिप्पणी भगवान कृष्ण अर्जुन के द्वितीय भाग के प्रश्न का उत्तर देते हैं कि 56वें, 57वें और 58वें श्लोकों में स्थिर बुद्धि वाले ऋषि का आचरण क्या है। स्थिर बुद्धि वाले ऋषि का मन विपत्तियों में दुःखी नहीं होता। वह तीनों तापों (Taapas) -- आध्यात्मिक (अपने शरीर में रोग या विकार से उत्पन्न), आधिदैविक (बिजली, बादल, तूफान, बाढ़ आदि से उत्पन्न), और आधिभौतिक (बिच्छू, नाग, बाघ आदि से उत्पन्न) से प्रभावित नहीं होता। जब वह समृद्ध परिस्थitिमें रहता है तो वह इंद्रिय सुखों के लिए तरसता नहीं है। (cf.IV.10)।

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