भगवान् कहते हैं – जब कोई मनुष्य, हे अर्जुन, मन की समस्त कामनाओं को पूरी तरह त्याग कर आत्मा से ही आत्मा में संतुष्ट हो जाता है, तब वह स्थिर बुद्धि वाला कहा जाता है।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द अर्थ भी उसी स्रोत से हैं। स्रोत
2.55 प्रजहाति त्याग देता है? यदा जब? कामान् इच्छाएं? सर्वान् सभी? पार्थ हे पार्थ? मनोगतान् मन की? आत्मनि आत्मा में? एव ही? आत्मना आत्मा के द्वारा? तुष्टः संतुष्ट? स्थितप्रज्ञः स्थिर बुद्धि वाला? तदा तब? उच्यते कहा जाता है।टिप्पणी इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन के प्रश्न के पहले भाग का उत्तर देते हैं। यदि किसी को गन्ने की मिठास मिल जाए तो क्या वह कालेघूर के लिए लालायित होगा? निश्चित रूप से नहीं। यदि कोई आत्मा का सर्वोच्च आनंद प्राप्त कर सके, तो क्या वह इंद्रिय सुखों के लिए तृषित होगा? नहीं, कदापि नहीं। स्थिर बुद्धि वाले ऋषि के लिए विश्व के सभी सुखों का कुल योग आत्मा में संतुष्ट होने के सामने तुच्छ प्रतीत होता है। (देखें III.17, VI.7-8)।
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2.55 प्रजहाति त्याग देता है? यदा जब? कामान् इच्छाएं? सर्वान् सभी? पार्थ हे पार्थ? मनोगतान् मन की? आत्मनि आत्मा में? एव ही? आत्मना आत्मा के द्वारा? तुष्टः संतुष्ट? स्थितप्रज्ञः स्थिर बुद्धि वाला? तदा तब? उच्यते कहा जाता है।टिप्पणी इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन के प्रश्न के पहले भाग का उत्तर देते हैं। यदि किसी को गन्ने की मिठास मिल जाए तो क्या वह कालेघूर के लिए लालायित होगा? निश्चित रूप से नहीं। यदि कोई आत्मा का सर्वोच्च आनंद प्राप्त कर सके, तो क्या वह इंद्रिय सुखों के लिए तृषित होगा? नहीं, कदापि नहीं। स्थिर बुद्धि वाले ऋषि के लिए विश्व के सभी सुखों का कुल योग आत्मा में संतुष्ट होने के सामने तुच्छ प्रतीत होता है। (देखें III.17, VI.7-8)।