श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला |
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ||२-५३||
śrutivipratipannā te yadā sthāsyati niścalā .
samādhāvacalā buddhistadā yogamavāpsyasi ||2-53||
जब तुम्हारी बुद्धि, जो वेदों के पठन से उलझी हुई है, आत्मा में अचल और स्थिर हो जाएगी, तब तुम आत्मबोध को प्राप्त करोगे।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत
2.53 श्रुतिविप्रतिपन्ना सुने हुए से उलझी हुई? ते तुम्हारी? यदा जब? स्थास्यति होगी? निश्चला अचल? समाधौ आत्मा में? अचला स्थिर? बुद्धिः बुद्धि? तदा तब? योगम् आत्मबोध? अवाप्स्यसि (तुम) को प्राप्त करोगे।टिप्पणी जब आपकी बुद्धि, जो प्रवृत्ति मार्ग (कर्म का मार्ग) और निवृत्ति मार्ग (सन्यास या त्याग का मार्ग) के बारे में विचारों के संघर्ष से व्याकुल रहती है, विचलित और संदेह से मुक्त हो गई है और आत्मा में दृढ़ता से स्थापित हो गई है, तब तुम आत्मबोध या आत्मा का ज्ञान (आत्मज्ञान) को प्राप्त करोगे।
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2.53 श्रुतिविप्रतिपन्ना सुने हुए से उलझी हुई? ते तुम्हारी? यदा जब? स्थास्यति होगी? निश्चला अचल? समाधौ आत्मा में? अचला स्थिर? बुद्धिः बुद्धि? तदा तब? योगम् आत्मबोध? अवाप्स्यसि (तुम) को प्राप्त करोगे।टिप्पणी जब आपकी बुद्धि, जो प्रवृत्ति मार्ग (कर्म का मार्ग) और निवृत्ति मार्ग (सन्यास या त्याग का मार्ग) के बारे में विचारों के संघर्ष से व्याकुल रहती है, विचलित और संदेह से मुक्त हो गई है और आत्मा में दृढ़ता से स्थापित हो गई है, तब तुम आत्मबोध या आत्मा का ज्ञान (आत्मज्ञान) को प्राप्त करोगे।