बेहतर अनुभव के लिए One Source Sangha को इंस्टॉल करें

भगवद् गीता 2.38

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ | ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ||२-३८||
sukhaduḥkhe same kṛtvā lābhālābhau jayājayau . tato yuddhāya yujyasva naivaṃ pāpamavāpsyasi ||2-38||
सुख और दुःख, लाभ और हानि, जय और पराजय को समान मानकर, युद्ध के लिए तत्पर हो जाओ; इस प्रकार तुम पाप के भागी नहीं होगे।

अंग्रेजी अनुवाद: Swami Sivananda (1942) · नीचे शब्द अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत

2.38 सुखदुःखे सुख और दुःख? समे समान? कृत्वा करके? लाभालाभौ लाभ और हानि? जयाजयौ जय और पराजय? ततः तब? युद्धाय युद्ध के लिए? युज्यस्व लगा दो? न नहीं? एवम् इस प्रकार? पापम् पाप? अवाप्स्यसि प्राप्त होगा।टिप्पणी यह समत्व योग या कर्म में समभाव का सिद्धांत है। यदि कोई उपरोक्त मानसिक दृष्टिकोण या संतुलित मन की स्थिति के साथ कोई कर्म करता है तो वह अपने कर्म के फल नहीं भोगेगा। ऐसा कर्म हृदय की शुद्धि और जन्म-मृत्यु से मुक्ति की ओर ले जाता है। निरंतर प्रयास और सतर्क प्रयासों के माध्यम से ऐसी संतुलित मन की स्थिति विकसित करनी होती है।

इस श्लोक पर Ananda के साथ चिंतन करें

यह श्लोक आपके अंदर क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — Ananda कई परंपराओं से प्रेरणा लेता है और आपके अपने पथ का सम्मान करता है।

हमारे साथ चलें

एक अंश, एक प्रश्न, हर रविवार। कुछ और नहीं, कभी नहीं।

🌐 English  ·  हिन्दी