हे अर्जुन! जो क्षत्रिय ऐसे युद्ध में लड़ने के लिए आमंत्रित होते हैं जो अपने आप ही आता है और स्वर्ग का द्वार खोलता है, वे सुखी हैं।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत
2.32 यदृच्छया अपने आप से? च और? उपपन्नम् आता है? स्वर्गद्वारम् स्वर्ग का द्वार? अपावृतम् खुला? सुखिनः सुखी? क्षत्रियाः क्षत्रिय? पार्थ हे पार्थ? लभन्ते प्राप्त करते हैं? युद्धम् युद्ध? ईदृशम् ऐसा। टिप्पणी शास्त्र कहते हैं कि यदि कोई क्षत्रिय धर्मयुद्ध में मारा जाता है, तो वह तुरंत स्वर्ग को जाता है।
इस श्लोक पर आनंद के साथ चिंतन करें
यह श्लोक आपके भीतर क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से प्रेरणा लेते हैं और आपके अपने पथ का सम्मान करते हैं।
2.32 यदृच्छया अपने आप से? च और? उपपन्नम् आता है? स्वर्गद्वारम् स्वर्ग का द्वार? अपावृतम् खुला? सुखिनः सुखी? क्षत्रियाः क्षत्रिय? पार्थ हे पार्थ? लभन्ते प्राप्त करते हैं? युद्धम् युद्ध? ईदृशम् ऐसा। टिप्पणी शास्त्र कहते हैं कि यदि कोई क्षत्रिय धर्मयुद्ध में मारा जाता है, तो वह तुरंत स्वर्ग को जाता है।