असत् (अनित्य) का कोई अस्तित्व नहीं है; सत् (नित्य) का कोई अस्तित्व नहीं न होना; दोनों का यह सत्य तत्त्वदर्शियों (सत्य के ज्ञानियों) द्वारा देखा गया है।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्दों के अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत
2.16 न नहीं? असतः असत् का? विद्यते है? भावः अस्तित्व? न नहीं? अभावः अस्तित्वहीनता? विद्यते है? सतः सत् का? उभयोः दोनों का? अपि भी? दृष्टः (देखा गया है)? अन्तः अंतिम सत्य? तु निश्चय ही? अनयोः इन दोनों का? तत्त्वदर्शिभिः तत्त्व के ज्ञानियों द्वारा।व्याख्या -- अपरिवर्तनीय, समरूप आत्मा या स्व सदैव विद्यमान है। यह एकमात्र ठोस वास्तविकता है। नाम और रूपों की यह घटना जगत् सदैव परिवर्तनशील है। इसलिए यह असत् है। ऋषि या जीवन्मुक्त पूरी तरह जानता है कि स्व सदैव विद्यमान है और यह जगत् एक मृगमरीचिका के समान है। अपनी ज्ञानचक्षु या अंतर्ज्ञान की आँख के माध्यम से वह सीधे आत्मा का साक्षात्कार करता है। यह जगत् उसके लिए उसी प्रकार लुप्त हो जाता है जैसे रस्सी में सांप, जब यह देखा जाता है कि केवल रस्सी ही है। वह नाम और रूपों को अस्वीकार करता है और सभी नाम और रूपों में निहित सार को ग्रहण करता है, अर्थात्, अस्ति-भाति-प्रिय या सच्चिदानंद या निरपेक्ष सत्ता-ज्ञान-आनंद। इसलिए वह तत्त्वदर्शी या सत्य या सार का ज्ञानी है।जो परिवर्तनशील है वह असत् होना चाहिए। जो स्थिर या शाश्वत है वह सत् होना चाहिए।
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2.16 न नहीं? असतः असत् का? विद्यते है? भावः अस्तित्व? न नहीं? अभावः अस्तित्वहीनता? विद्यते है? सतः सत् का? उभयोः दोनों का? अपि भी? दृष्टः (देखा गया है)? अन्तः अंतिम सत्य? तु निश्चय ही? अनयोः इन दोनों का? तत्त्वदर्शिभिः तत्त्व के ज्ञानियों द्वारा।व्याख्या -- अपरिवर्तनीय, समरूप आत्मा या स्व सदैव विद्यमान है। यह एकमात्र ठोस वास्तविकता है। नाम और रूपों की यह घटना जगत् सदैव परिवर्तनशील है। इसलिए यह असत् है। ऋषि या जीवन्मुक्त पूरी तरह जानता है कि स्व सदैव विद्यमान है और यह जगत् एक मृगमरीचिका के समान है। अपनी ज्ञानचक्षु या अंतर्ज्ञान की आँख के माध्यम से वह सीधे आत्मा का साक्षात्कार करता है। यह जगत् उसके लिए उसी प्रकार लुप्त हो जाता है जैसे रस्सी में सांप, जब यह देखा जाता है कि केवल रस्सी ही है। वह नाम और रूपों को अस्वीकार करता है और सभी नाम और रूपों में निहित सार को ग्रहण करता है, अर्थात्, अस्ति-भाति-प्रिय या सच्चिदानंद या निरपेक्ष सत्ता-ज्ञान-आनंद। इसलिए वह तत्त्वदर्शी या सत्य या सार का ज्ञानी है।जो परिवर्तनशील है वह असत् होना चाहिए। जो स्थिर या शाश्वत है वह सत् होना चाहिए।