बेहतर अनुभव के लिए One Source Sangha इंस्टॉल करें

भगवद् गीता 2.15

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ | समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ||२-१५||
yaṃ hi na vyathayantyete puruṣaṃ puruṣarṣabha . samaduḥkhasukhaṃ dhīraṃ so.amṛtatvāya kalpate ||2-15||
वह दृढ़ पुरुष, जिसे ये निश्चित रूप से व्यथित नहीं करते, हे मनुष्यों में श्रेष्ठ, जिसके लिए सुख और दुःख समान हैं, वह अमरता प्राप्त करने के लिए योग्य है।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी सिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ समान स्रोत से हैं। स्रोत

2.15 यम् किसे? हि निश्चित रूप से? न व्यथयन्ति व्यथित नहीं करते? एते ये? पुरुषम् पुरुष को? पुरुषर्षभ मनुष्यों में श्रेष्ठ? समदुःखसुखम् सुख और दुःख में समान? धीरम् दृढ़? सः वह? अमृतत्वाय अमरता के लिए? कल्पते योग्य है।टीका -- देहाध्यास या आत्मा का शरीर से तादात्म्य ही सुख और दुःख का कारण है। जितना अधिक आप स्वयं को अमर, सर्वव्यापी आत्मा के साथ तादात्म्य स्थापित करते हैं, उतना ही कम आप द्वंद्वों (द्वंद्व - सुख और दुःख आदि) से प्रभावित होते हैं। तितिक्षा या सहन शक्ति दृढ़ संकल्प विकसित करती है। सुख और दुःख, गर्मी और ठंड में शांत सहन एक ज्ञान योग पथ पर साधक के योग्यताओं में से एक है। यह षट्सम्पत्ति या छह गुणों में से एक है। यह सही ज्ञान की शर्त है। तितिक्षा अपने आप से आपको मोक्ष या मुक्ति नहीं दे सकती, लेकिन फिर भी, जब विवेक और वैराग्य के साथ जुड़ी हो, तो यह अमरता या आत्म-ज्ञान की प्राप्ति का साधन बन जाती है। (cf.XVII.53)

इस श्लोक पर आनंद के साथ चिंतन करें

यह श्लोक आपके अंदर क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से लेता है और आपके अपने मार्ग को सम्मानित करता है।

हमारे साथ चलें

एक पाठ, एक प्रश्न, हर रविवार। और कुछ भी नहीं, कभी नहीं।

🌐 English  ·  हिन्दी