बेहतर अनुभव के लिए One Source Sangha इंस्टॉल करें

भगवद गीता २.१२

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः | न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ||२-१२||
na tvevāhaṃ jātu nāsaṃ na tvaṃ neme janādhipāḥ . na caiva na bhaviṣyāmaḥ sarve vayamataḥ param ||2-12||
मैं कभी विद्यमान नहीं था, न तुम थे, न ये मनुष्यों के राजा थे, और न ही हम कभी भविष्य में विद्यमान नहीं रहेंगे।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (१९४२) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत

२.१२ न नहीं? तु निश्चित रूप से? एव भी? अहम् मैं? जातु कभी? न नहीं? आसम् था? न नहीं? त्वम् तुम? न नहीं? इमे ये? जनाधिपाः मनुष्यों के राजा? न नहीं? च और? एव भी? न नहीं? भविष्यामः होंगे? सर्वे सभी? वयम् हम? अतः इस समय से? परम् बाद में।टिप्पणी -- भगवान कृष्ण यहां आत्मा की अमरता या स्व (आत्मन्) की अविनाशी प्रकृति के बारे में बोल रहे हैं। आत्मा तीनों समय अवधियों (अतीत, वर्तमान और भविष्य) में विद्यमान रहती है। मनुष्य शारीरिक शरीर की मृत्यु के बाद भी विद्यमान रहता है। मृत्यु के परे जीवन है।

इस श्लोक पर आनंद के साथ विचार करें

यह श्लोक आपके अंदर क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से लेता है और आपके अपने पथ का सम्मान करता है।

हमारे साथ चलें

एक अंश, एक प्रश्न, हर रविवार। कुछ और नहीं, कभी नहीं।

🌐 English  ·  हिन्दी