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भगवद गीता 18.73

अर्जुन उवाच | नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत | स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ||१८-७३||
arjuna uvāca . naṣṭo mohaḥ smṛtirlabdhā tvatprasādānmayācyuta . sthito.asmi gatasandehaḥ kariṣye vacanaṃ tava ||18-73||
अर्जुन ने कहा — हे कृष्ण, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे सच्चा ज्ञान (स्मृति) प्राप्त हो गया है। मैं संदेह से मुक्त हूँ। मैं आपके वचन के अनुसार कार्य करूँगा।

अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत

18.73 नष्टः नष्ट हुआ? मोहः मोह? स्मृतिः स्मृति (ज्ञान)? लब्धा प्राप्त हुई? त्वत्प्रसादात् आपकी कृपा से? मया मेरे द्वारा? अच्युत हे कृष्ण? स्थितः अस्मि मैं स्थित हूँ? गतसन्देहः संदेह से रहित? करिष्ये (मैं) करूँगा? वचनम् वचन? तव आपका।टिप्पणी मोह (मोहन) यह माया का सबसे शक्तिशाली अस्त्र है जो जीवों को अपने पास बाँधे रखता है। यह अज्ञान से उत्पन्न होता है। यह संसार की सभी बुराइयों का कारण है। यह महासागर को पार करने जितना कठिन है।स्मृति — मैंने आत्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर लिया है। साधना या आध्यात्मिक अभ्यास और शास्त्रों के अध्ययन का संपूर्ण लक्ष्य मोह का विनाश और आत्मज्ञान की प्राप्ति है। जब यह मिल जाता है, तो अज्ञान की तीनों गाँठें, अर्थात् अज्ञान, मोह (वासना) और कर्म नष्ट हो जाती हैं, सभी संदेह दूर हो जाते हैं, और सभी कर्म नष्ट हो जाते हैं।जो सभी प्राणियों में आत्मा को देखता है, उसे क्या मोह है, क्या दुःख है? (ईशावास्य उपनिषद, 7)मैं आपके वचन का पालन करूँगा — अर्जुन का अर्थ है कि मैं आपके उद्देश्य में दृढ़ हूँ। आपकी कृपा से मैंने जीवन का लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। अब मेरे पास कुछ और नहीं करना है।

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