बेहतर अनुभव के लिए One Source Sangha को इंस्टॉल करें

भगवद् गीता 18.62

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत | तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ||१८-६२||
tameva śaraṇaṃ gaccha sarvabhāvena bhārata . tatprasādātparāṃ śāntiṃ sthānaṃ prāpsyasi śāśvatam ||18-62||
हे अर्जुन, सम्पूर्ण भाव से उसी की शरण में जाओ; उसकी कृपा से तुम परम शान्ति (और) शाश्वत निवास को प्राप्त करोगे।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ समान स्रोत से हैं। स्रोत

18.62 तम् उसे? एव ही? शरणम् शरण? गच्छ जाओ? सर्वभावेन सभी भाव से? भारत हे भारत? तत्प्रसादात् उसकी कृपा से? पराम् परम? शान्तिम् शान्ति? स्थानम् निवास? प्राप्स्यसि तुम प्राप्त करोगे? शाश्वतम् शाश्वत।व्याख्या प्रभु के प्रति पूर्ण और संपूर्ण समर्पण करो। किसी गुप्त इच्छा को मौन संतुष्टि के लिए न रखो। इच्छा और अहंकार दो मुख्य बाधाएं हैं जो आत्मसमर्पण के रास्ते में खड़ी हैं। उन्हें निर्दयतापूर्वक नष्ट करो।संसार की परेशानियों, कष्टों और दुःखों से मुक्त होने के लिए अपने सभी भाव से प्रभु की शरण में दौड़ो। प्रभु को एकमात्र शरण मानो। तब उसकी कृपा से, तुम परम शान्ति प्राप्त करोगे और परम, शाश्वत निवास तक पहुंचोगे।

इस श्लोक पर Ananda के साथ चिंतन करें

यह श्लोक आपके अंदर क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — Ananda कई परंपराओं से निकलता है और आपके अपने पथ को सम्मान देता है।

हमारे साथ चलें

एक मार्ग, एक प्रश्न, हर रविवार। कुछ नहीं और, कभी नहीं।

🌐 English  ·  हिन्दी