अहंकार, शक्ति, अहंभाव, इच्छा, क्रोध और लोभ को त्यागकर, 'मेरे' की धारणा से मुक्त होकर और शांतिपूर्ण होकर, वह ब्रह्म बनने के लिए तैयार है।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द के अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत
18.53 अहङ्कारम् अहंकार? बलम् शक्ति? दर्पम् अहंभाव? कामम् इच्छा? क्रोधम् क्रोध? परिग्रहम् लोभ? विमुच्य त्यागकर? निर्ममः 'मेरेपन' से मुक्त? शान्तः शांतिपूर्ण? ब्रह्मभूयाय ब्रह्म बनने के लिए? कल्पते (वह) तैयार है।टिप्पणी अहंकार शरीर आदि के साथ आत्म की पहचान। यह शुद्ध अमर आत्म को भौतिक शरीर के लिए गलती से लेना है।शक्ति वह शक्ति जो जुनून, इच्छा और आसक्ति के साथ जुड़ी या एकीभूत है, न कि भौतिक या अन्य शक्ति। भौतिक शक्ति प्राकृतिक है। इस भौतिक शक्ति को त्यागना संभव नहीं है।अहंभाव घमंड, असभ्यता, आत्मविश्वासी राजसिक प्रवाह यह उन्नत स्थिति के बाद आता है।व्यक्ति तब घमंडी हो जाता है जब उसके पास धन या बहुत ज्ञान हो। जब वह घमंडी हो जाता है तो वह धर्म का उल्लंघन करता है और दुष्ट कर्म करता है।साधक शरीर की बनी रहने के लिए आवश्यक चीजों को भी त्याग देता है। वह एक परमहंस परिव्राजक, एक भटकता या घुमंतू तपस्वी बन जाता है। उसे अपने शरीर से कोई आसक्ति नहीं है। वह जानता है कि शरीर भी उसका नहीं है।शांत शांतिपूर्ण, निर्मल, मनोरम।ऐसा साधक जिसे आत्मज्ञान में भक्ति है और जो उपरोक्त गुणों से संपन्न है, ब्रह्म बनने के लिए योग्य है।
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यह श्लोक आपके अंदर क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से ज्ञान लेता है और आपके अपने पथ का सम्मान करता है।
18.53 अहङ्कारम् अहंकार? बलम् शक्ति? दर्पम् अहंभाव? कामम् इच्छा? क्रोधम् क्रोध? परिग्रहम् लोभ? विमुच्य त्यागकर? निर्ममः 'मेरेपन' से मुक्त? शान्तः शांतिपूर्ण? ब्रह्मभूयाय ब्रह्म बनने के लिए? कल्पते (वह) तैयार है।टिप्पणी अहंकार शरीर आदि के साथ आत्म की पहचान। यह शुद्ध अमर आत्म को भौतिक शरीर के लिए गलती से लेना है।शक्ति वह शक्ति जो जुनून, इच्छा और आसक्ति के साथ जुड़ी या एकीभूत है, न कि भौतिक या अन्य शक्ति। भौतिक शक्ति प्राकृतिक है। इस भौतिक शक्ति को त्यागना संभव नहीं है।अहंभाव घमंड, असभ्यता, आत्मविश्वासी राजसिक प्रवाह यह उन्नत स्थिति के बाद आता है।व्यक्ति तब घमंडी हो जाता है जब उसके पास धन या बहुत ज्ञान हो। जब वह घमंडी हो जाता है तो वह धर्म का उल्लंघन करता है और दुष्ट कर्म करता है।साधक शरीर की बनी रहने के लिए आवश्यक चीजों को भी त्याग देता है। वह एक परमहंस परिव्राजक, एक भटकता या घुमंतू तपस्वी बन जाता है। उसे अपने शरीर से कोई आसक्ति नहीं है। वह जानता है कि शरीर भी उसका नहीं है।शांत शांतिपूर्ण, निर्मल, मनोरम।ऐसा साधक जिसे आत्मज्ञान में भक्ति है और जो उपरोक्त गुणों से संपन्न है, ब्रह्म बनने के लिए योग्य है।