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भगवद गीता 18.52

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः | ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ||१८-५२||
viviktasevī laghvāśī yatavākkāyamānasaḥ . dhyānayogaparo nityaṃ vairāgyaṃ samupāśritaḥ ||18-52||
एकांत में रहने वाला, थोड़ा भोजन करने वाला, वाणी, शरीर और मन को नियंत्रित करने वाला, सदा ध्यान-योग में लगा हुआ, वैराग्य का आश्रय लेने वाला।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत

18.52 विविक्तसेवी एकांत में रहने वाला? लघ्वाशी थोड़ा भोजन करने वाला? यतवाक्कायमानसः वाणी? शरीर और मन को नियंत्रित करने वाला? ध्यानयोगपरः ध्यान-योग में लगा हुआ? नित्यम् सदा? वैराग्यम् वैराग्य? समुपाश्रितः आश्रय लेने वाला। टिप्पणी एकांत का अपना आकर्षण है। एकांत में आध्यात्मिक कंपन अद्भुत रूप से उन्नत करने वाले हैं। ध्यान बिना प्रयास के अपने आप आता है। सभी संत और ऋषि जिन्होंने आत्मसाक्षात्कार प्राप्त किया है, वर्षों के लिए एकांत में रहे हैं। यदि आप नदी के किनारे बैठें? गुफा में या समुद्र के किनारे या जंगल में तो आपको अच्छा ध्यान मिलेगा। क्रिसमस और ईस्टर की छुट्टियों के दौरान आप सभी एकांत की शांति का आनंद ले सकते हैं। गृहस्थों के लिए वर्ष में कम से कम एक महीने या पखवाड़े के लिए एकांत में रहना बहुत आवश्यक है। कोलकाता या किसी अन्य शहर में समय? ऊर्जा और पैसे बर्बाद करने के बजाय? छुट्टियों के दौरान ऋषिकेश? उत्तरकाशी या नैमिषारण्य जैसे पवित्र स्थानों में रहें और अनुष्ठान (गहन और व्यवस्थित आध्यात्मिक अभ्यास) या मंत्र का जप करके शांति का अमृत पिएं और अमरत्व प्राप्त करें। यदि आप एक बार एकांत के आनंद का स्वाद चख लेंगे तो आप इसे कभी नहीं भूलेंगे। हर साल आप इसे फिर से चखने का प्रयास करेंगे। जो अधिक भोजन करता है (पेटू) वह ध्यान या आध्यात्मिक पथ के लिए बिल्कुल अनुपयुक्त है। अधिक भोजन आलस्य? आधी नींद की स्थिति और गहरी नींद भी पैदा करेगा। जीने के लिए खाएं। संतुलन में खाएं। आपका शरीर हल्का होगा और आपका मन हल्का? प्रसन्न और शांत होगा। यह आपके ध्यान के अभ्यास में मदद करेगा। एक सप्ताह या एक महीने के लिए मौन (मौन की प्रतिज्ञा) का पालन करें। प्रतिदिन दो घंटे के लिए प्रतिज्ञा का पालन करें। शरीर पर नियंत्रण रखें। अहिंसा और ब्रह्मचर्य का अभ्यास करें। आत्मा पर या चार भुजाओं वाले भगवान हरि पर या भगवान कृष्ण? राम या शिव पर ध्यान करें। अपने ध्यान में नियमित रहें और धीरे-धीरे ध्यान की अवधि को 15 मिनट से 3 या 6 घंटे तक बढ़ाएं। यदि आप पूर्णकालिक साधक हैं? पूरा समय ध्यान में लगाएं। यदि आप ऐसा नहीं कर सकते? लिखित जप (मंत्र लिखना) और कीर्तन (भगवान के नाम और महिमा का गान) करें। बीच में धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन करें। केवल उन्नत साधक ही लंबे समय तक ध्यान कर सकते हैं। मन को देखें और वैराग्य का विकास करें। यदि आप लापरवाह और असावधान हैं तो ऊर्जा इंद्रियों के माध्यम से रिसेगी। यदि ऊर्जा रिसेगी? तो आपको अच्छा ध्यान नहीं मिल सकता। वैराग्य संवेदनशील आनंद के प्रति उदासीनता है यहां और परलोक में? दृश्य और अदृश्य वस्तुओं के लिए इच्छा का अभाव। आपके पास स्थिर? स्थायी और निरंतर वैराग्य होना चाहिए। यह कम नहीं होना चाहिए। यह मन का एक निरंतर दृष्टिकोण होना चाहिए। आपको वैराग्य में पूरी तरह स्थापित होना चाहिए। 40 दिनों के लिए अनुष्ठान करते समय दूध और फल या हल्का आहार लें। केवल 3 या 4 खाद्य पदार्थ लें। केवल एक भोजन करें। फर्श पर सोएं। ब्रह्मचर्य और मौन की प्रतिज्ञा का पालन करें। कमरे से बाहर न आएं। यदि आप पूर्ण मौन का पालन नहीं करते तो कम बोलें। गंगा के किनारे या किसी पवित्र नदी पर अनुष्ठान करें। अपने इष्ट मंत्र का एक या कई पुरश्चरण करने का प्रयास करें। यदि मंत्र में पाँच अक्षरें (अंग्रेजी में पाँच अक्षर) हैं? तो मंत्र के 500,000 जप एक पुरश्चरण का गठन करेंगे।

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यह श्लोक आपमें क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से लेता है और आपके अपने पथ का सम्मान करता है।

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