बेहतर अनुभव के लिए One Source Sangha इंस्टॉल करें

भगवद्गीता 18.50

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे | समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ||१८-५०||
siddhiṃ prāpto yathā brahma tathāpnoti nibodha me . samāsenaiva kaunteya niṣṭhā jñānasya yā parā ||18-50||
मुझसे संक्षेप में सीखो, हे अर्जुन, कि जो सिद्धि प्राप्त हो गया है वह ब्रह्म (शाश्वत) को कैसे प्राप्त करता है, जो ज्ञान की परम अवस्था है।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्द अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत

18.50 सिद्धिम् सिद्धि? प्राप्तः प्राप्त? यथा जैसे? ब्रह्म ब्रह्म (शाश्वत)? तथा तो? आप्नोति प्राप्त करता है? निबोध सीखो? मे मुझसे? समासेन संक्षेप में? एव ही? कौन्तेय हे कुंती के पुत्र? निष्ठा अवस्था? ज्ञानस्य ज्ञान की? या या? परा सर्वोच्च।व्याख्या जब किसी को एक गुरु से ज्ञान की बातें सुनने का सौभाग्य मिलता है, तो द्वैतवाद और अहंकार लुप्त हो जाते हैं और उसका मन परमात्मा के साथ एकता में विश्राम करता है। ऐसे व्यक्ति के लिए कर्म की आवश्यकता अब नहीं रहती। उसके लिए आगे कुछ नहीं करना है। वह कृतकृत्य (सर्वांगीण पूर्ति वाला व्यक्ति, या जिसने सब कुछ कर दिया है) हो गया है।साधक अपने उचित कर्तव्य से ईश्वर की पूजा करके उसकी कृपा प्राप्त करता है। भगवान उसे वैराग्य, विवेक और ज्ञान की भक्ति देते हैं। भगवान उसके अज्ञान के आवरण को हटा देते हैं। इन सदा समरस, प्रेम से पूजा करने वालों को मैं भेदज्ञान का योग देता हूँ जिससे वे मेरे पास आते हैं। मेरी करुणा से ही मैं उनके अंतर में निवास करके अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को ज्ञान के दीप्तिमान दीप से नष्ट कर देता हूँ। (X.10और11)सिद्धि ज्ञाननिष्ठा या ज्ञान की भक्ति है जिससे वह आत्मबोध प्राप्त करता है या परमात्मा के साथ एकरूप हो जाता है जब अज्ञान का आवरण फट जाता है। इस ज्ञान की भक्ति की प्राप्ति का तरीका केवल संक्षेप में ही बताया जाएगा। आत्मबोध की प्रक्रिया या विधि आने वाले श्लोकों में केवल संक्षेप में ही बताई जाएगी।वास्तविक तकनीक को सीधे एक गुरु से सीखना है।

इस श्लोक पर Ananda के साथ चिंतन करें

यह श्लोक आपके मन में क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — Ananda कई परंपराओं से उद्धरण लेता है और आपके अपने मार्ग का सम्मान करता है।

🌐 English  ·  हिन्दी