yajñadānatapaḥkarma na tyājyaṃ kāryameva tat .
yajño dānaṃ tapaścaiva pāvanāni manīṣiṇām ||18-5||
यज्ञ, दान और तपस्या के कर्मों को त्यागना नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें करते रहना चाहिए; यज्ञ, दान और तपस्या ही बुद्धिमानों के हृदय को शुद्ध करने वाली हैं।
अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ समान स्रोत से हैं। स्रोत
18.5 यज्ञदानतपःकर्म यज्ञ, दान और तपस्या के कर्म? न not? त्याज्यम् त्यागे जाने योग्य नहीं? कार्यम् किए जाने योग्य? एव निश्चित रूप से? तत् वह? यज्ञः यज्ञ? दानम् दान? तपः तपस्या? च और? एव निश्चित रूप से? पावनानि शुद्ध करने वाली? मनीषिणाम् बुद्धिमानों की। व्याख्या यज्ञ, दान और तपस्या वे कर्म हैं जो पुरस्कार की इच्छा रखने वालों के हृदयों को शुद्ध करते हैं। इन कार्यों को अनिवार्य माना जाता है और किए जाने चाहिए। कुशलतापूर्वक किए गए कर्म अपनी शक्ति खो देते हैं आत्मा को बाँधने की और इसे पार्थिक बंधन से मुक्त करते हैं। अब, हे अर्जुन, मैं तुम्हें उस कुशल तरीके की व्याख्या करूँगा जिससे कर्म अपने प्रभाव को नष्ट कर सकते हैं।
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18.5 यज्ञदानतपःकर्म यज्ञ, दान और तपस्या के कर्म? न not? त्याज्यम् त्यागे जाने योग्य नहीं? कार्यम् किए जाने योग्य? एव निश्चित रूप से? तत् वह? यज्ञः यज्ञ? दानम् दान? तपः तपस्या? च और? एव निश्चित रूप से? पावनानि शुद्ध करने वाली? मनीषिणाम् बुद्धिमानों की। व्याख्या यज्ञ, दान और तपस्या वे कर्म हैं जो पुरस्कार की इच्छा रखने वालों के हृदयों को शुद्ध करते हैं। इन कार्यों को अनिवार्य माना जाता है और किए जाने चाहिए। कुशलतापूर्वक किए गए कर्म अपनी शक्ति खो देते हैं आत्मा को बाँधने की और इसे पार्थिक बंधन से मुक्त करते हैं। अब, हे अर्जुन, मैं तुम्हें उस कुशल तरीके की व्याख्या करूँगा जिससे कर्म अपने प्रभाव को नष्ट कर सकते हैं।