sve sve karmaṇyabhirataḥ saṃsiddhiṃ labhate naraḥ .
svakarmanirataḥ siddhiṃ yathā vindati tacchṛṇu ||18-45||
जो मनुष्य अपने-अपने कर्मों में लगा रहता है, वह सिद्धि को प्राप्त होता है। जो अपने कर्म में लगा रहता है, वह सिद्धि को कैसे प्राप्त करता है, यह सुनो।
अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत
5.10 ब्रह्मणि ब्रह्म में? आधाय रखकर? कर्माणि कर्मों को? सङ्गम् आसक्ति? त्यक्त्वा त्यागकर? करोति करता है? यः जो? लिप्यते लिप्त होता है? न नहीं? सः वह? पापेन पाप से? पद्मपत्रम् कमल का पत्ता? इव की तरह? अम्भसा पानी से। व्याख्या अध्याय IV श्लोक 18? 20? 21? 22? 23? 37? 41 अध्याय V श्लोक 10? 11 और 12 सभी एक ही विचार को व्यक्त करते हैं कि जो योगी बिना अहंकार और कर्मों के फलों के प्रति आसक्ति के कार्य करता है, जिन्हें वह प्रभु को समर्पित मानता है, वह कर्मों से लिप्त नहीं होता। उसे मोक्ष के लिए भी आसक्ति नहीं है। वह कर्म में अकर्म देखता है। सभी उसके कर्म ज्ञान की आग में जल जाते हैं। वह संसार के चक्र से बच जाता है। वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है। उसे हृदय की शुद्धि मिलती है और हृदय की शुद्धि के माध्यम से आत्मा का ज्ञान प्राप्त होता है। आत्मज्ञान के माध्यम से वह मुक्त हो जाता है। यह उपरोक्त दस श्लोकों का सार है। (देखें III.30)
इस श्लोक पर आनंद के साथ विचार करें
यह श्लोक आपके मन में क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से सीखते हैं और आपके अपने मार्ग का सम्मान करते हैं।
5.10 ब्रह्मणि ब्रह्म में? आधाय रखकर? कर्माणि कर्मों को? सङ्गम् आसक्ति? त्यक्त्वा त्यागकर? करोति करता है? यः जो? लिप्यते लिप्त होता है? न नहीं? सः वह? पापेन पाप से? पद्मपत्रम् कमल का पत्ता? इव की तरह? अम्भसा पानी से। व्याख्या अध्याय IV श्लोक 18? 20? 21? 22? 23? 37? 41 अध्याय V श्लोक 10? 11 और 12 सभी एक ही विचार को व्यक्त करते हैं कि जो योगी बिना अहंकार और कर्मों के फलों के प्रति आसक्ति के कार्य करता है, जिन्हें वह प्रभु को समर्पित मानता है, वह कर्मों से लिप्त नहीं होता। उसे मोक्ष के लिए भी आसक्ति नहीं है। वह कर्म में अकर्म देखता है। सभी उसके कर्म ज्ञान की आग में जल जाते हैं। वह संसार के चक्र से बच जाता है। वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है। उसे हृदय की शुद्धि मिलती है और हृदय की शुद्धि के माध्यम से आत्मा का ज्ञान प्राप्त होता है। आत्मज्ञान के माध्यम से वह मुक्त हो जाता है। यह उपरोक्त दस श्लोकों का सार है। (देखें III.30)