बेहतर अनुभव के लिए One Source Sangha इंस्टॉल करें

भगवद् गीता 18.39

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः | निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ||१८-३९||
yadagre cānubandhe ca sukhaṃ mohanamātmanaḥ . nidrālasyapramādotthaṃ tattāmasamudāhṛtam ||18-39||
जो सुख प्रारंभ में और अनुबंध में आत्म को मोहित करता है, और जो नींद, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न होता है, वह तामसिक कहा जाता है।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ एसी स्रोत से हैं। स्रोत

18.39 यत् कौन? अग्रे प्रारंभ में? च और? अनुबन्धे परिणति में? च और? सुखम् आनंद? मोहनम् भ्रामक? आत्मनः आत्म का? निद्रालस्यप्रमादोत्थम् नींद, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न? तत् वह? तामसम् तामसिक? उदाहृतम् कहा जाता है। टिप्पणी अनुबन्धे परिणति के बाद। जो सुख बुरी आदतों जैसे शराब पीने और व्यर्थ खाने से उत्पन्न होता है वह आत्म को भ्रामक है। मनुष्य उस पथ को भूल जाता है जिसे उसे चलना चाहिए। ऐसा सुख वास्तव में अंधकार की प्रकृति का है।

Ananda के साथ इस श्लोक पर विचार करें

यह श्लोक आपको क्या सोचने पर विवश करता है? कोई भी प्रश्न पूछें — Ananda कई परंपराओं से सूचना लेता है और आपके अपने पथ का सम्मान करता है।

हमारे साथ चलें

एक मार्ग, एक प्रश्न, हर रविवार। कभी कुछ और नहीं।

🌐 English  ·  हिन्दी