बेहतर अनुभव के लिए One Source Sangha इंस्टॉल करें

भगवद्गीता 18.20

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते | अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ||१८-२०||
sarvabhūteṣu yenaikaṃ bhāvamavyayamīkṣate . avibhaktaṃ vibhakteṣu tajjñānaṃ viddhi sāttvikam ||18-20||
जिस ज्ञान से कोई सभी प्राणियों में एक अविनाशी सत्ता को देखता है, सभी अलग-अलग प्राणियों में अविभक्त को देखता है, तुम उस ज्ञान को सात्त्विक जानो।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ समान स्रोत से हैं। स्रोत

18.20 सर्वभूतेषु सभी प्राणियों में? येन जिस द्वारा? एकम् एक? भावम् सत्ता? अव्ययम् अविनाशी? ईक्षते देखता है? अविभक्तम् अविभक्त? विभक्तेषु विभक्त में? तत् वह? ज्ञानम् ज्ञान? विद्धि जानो? सात्त्विकम् सात्त्विक (शुद्ध)।टिप्पणी वह ज्ञान जो सभी वस्तुओं में कोई अंतर नहीं देखता, शुद्ध है। दृष्टा सभी वस्तुओं की विविधता के पीछे एक सर्वव्यापी अविनाशी सार को देखता है। वह विविधता में एकता को, अनेकता में एक को, सब में एक को देखता है। वह देखता है कि सभी विविध वस्तुएँ एक में निहित हैं।भावम् सत्ता अद्वैत आत्मा।सर्वभूतेषु सभी प्राणियों में अव्यक्त से लेकर निर्जीव और गतिहीन वस्तुओं तक।अव्ययम् अविनाशी, अक्षय, अपरिवर्तनीय, जो स्वयं में या अपने गुणों में कभी समाप्त नहीं हो सकता, शाश्वत।जैसे आकाश अविभक्त है, वैसे ही आत्मा अविभक्त है। आत्मा सभी शरीरों में एक है। यह सभी शरीरों में सामान्य चेतना है। यह विभिन्न शरीरों में भिन्न नहीं है। यह सभी शरीरों में, सभी प्राणियों में एक सजातीय अविभक्त सार या सत्ता है। हे अर्जुन, तुम इस अद्वैत आत्मा की सीधी और सही प्रत्यक्षता को सात्त्विक जानो। (तुलना करें IV.35 VI.29 XIII.16–28 XVIII.30)

इस श्लोक पर आनंद के साथ विचार करें

यह श्लोक आपके अंदर क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से खींचता है और आपके अपने मार्ग का सम्मान करता है।

हमारे साथ चलें

एक मार्ग, एक प्रश्न, हर रविवार। और कुछ नहीं, कभी नहीं।

🌐 English  ·  हिन्दी