सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत |
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ||१७-३||
sattvānurūpā sarvasya śraddhā bhavati bhārata .
śraddhāmayo.ayaṃ puruṣo yo yacchraddhaḥ sa eva saḥ ||17-3||
प्रत्येक की श्रद्धा उसके स्वभाव के अनुसार होती है, हे अर्जुन। मनुष्य अपनी श्रद्धा से ही बना होता है; जैसी उसकी श्रद्धा है, वैसा ही वह है।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत
17.3 सत्त्वानुरूपा उसके स्वभाव के अनुसार? सर्वस्य प्रत्येक की? श्रद्धा श्रद्धा? भवति है? भारत हे अर्जुन? श्रद्धामयः श्रद्धा से युक्त? अयम् यह? पुरुषः मनुष्य? यः जो? यच्छ्रद्धः जिसकी श्रद्धा जैसी है? सः वह? एव ही? सः वह (है)।टिप्पणी प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा उसके अंतर्निहित स्वभाव या प्राकृतिक प्रवृत्ति के अनुसार होती है। मनुष्य श्रद्धा से परिपूर्ण है। पिछले श्लोक में प्रयुक्त शब्द स्वभाव और वर्तमान श्लोक में सत्त्व पर्यायवाची हैं। एक व्यक्ति की विशेषता उसकी श्रद्धा से जानी जा सकती है। एक व्यक्ति की श्रद्धा दर्शाती है कि उसका चरित्र क्या है। एक मनुष्य वही है जो उसकी श्रद्धा ने उसे बनाया है। एक व्यक्ति का जीवन में आचरण उसकी श्रद्धा से निर्मित होता है। उसकी श्रद्धा उसकी निष्ठा (अवस्था? विश्वास) को प्रदर्शित करेगी। प्रत्येक मनुष्य की श्रद्धा उसकी प्राकृतिक प्रवृत्ति या विशिष्ट प्रवृत्तियों या संस्कारों या पिछले जन्मों में किए गए अच्छे और बुरे कार्यों के आत्मपुनरुत्पादक गुप्त प्रभाव के अनुसार होती है। प्रत्येक मनुष्य की श्रद्धा उसके अस्तित्व की सामग्री, उसकी प्रवृत्ति, प्रवृत्तियों या संस्कारों से रंग लेती है।सत्त्व स्वभाव प्राकृतिक प्रवृत्ति मन और उसकी विशिष्ट प्रवृत्तियां।प्रत्येक प्रत्येक जीवित प्राणी।पुरुष मनुष्य व्यक्तिगत आत्मा जो जन्म-मरण के चक्र में फंसी हुई है, मन से सीमित आत्मा।श्रद्धामयः श्रद्धा से पूर्ण जैसे अन्नमय कोश खाद्य पदार्थों से पूर्ण है, जैसे आनंदमय कोश आनंद से पूर्ण है, वैसे ही अंतःकरण (मन, बुद्धि आदि) श्रद्धा से पूर्ण है।मनुष्य अपनी श्रद्धा से बना होता है जो उसकी श्रद्धा है, वह स्वयं वही है। यह सिद्धांत केवल अध्याय VII, श्लोक 20 और 23, तथा अध्याय IX, श्लोक 25 में प्रतिपादित सिद्धांत की पुनरावृत्ति है।
इस श्लोक पर आनंद के साथ ध्यान करें
यह श्लोक आपके अंदर क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से निकालता है और आपके अपने मार्ग का सम्मान करता है।
17.3 सत्त्वानुरूपा उसके स्वभाव के अनुसार? सर्वस्य प्रत्येक की? श्रद्धा श्रद्धा? भवति है? भारत हे अर्जुन? श्रद्धामयः श्रद्धा से युक्त? अयम् यह? पुरुषः मनुष्य? यः जो? यच्छ्रद्धः जिसकी श्रद्धा जैसी है? सः वह? एव ही? सः वह (है)।टिप्पणी प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा उसके अंतर्निहित स्वभाव या प्राकृतिक प्रवृत्ति के अनुसार होती है। मनुष्य श्रद्धा से परिपूर्ण है। पिछले श्लोक में प्रयुक्त शब्द स्वभाव और वर्तमान श्लोक में सत्त्व पर्यायवाची हैं। एक व्यक्ति की विशेषता उसकी श्रद्धा से जानी जा सकती है। एक व्यक्ति की श्रद्धा दर्शाती है कि उसका चरित्र क्या है। एक मनुष्य वही है जो उसकी श्रद्धा ने उसे बनाया है। एक व्यक्ति का जीवन में आचरण उसकी श्रद्धा से निर्मित होता है। उसकी श्रद्धा उसकी निष्ठा (अवस्था? विश्वास) को प्रदर्शित करेगी। प्रत्येक मनुष्य की श्रद्धा उसकी प्राकृतिक प्रवृत्ति या विशिष्ट प्रवृत्तियों या संस्कारों या पिछले जन्मों में किए गए अच्छे और बुरे कार्यों के आत्मपुनरुत्पादक गुप्त प्रभाव के अनुसार होती है। प्रत्येक मनुष्य की श्रद्धा उसके अस्तित्व की सामग्री, उसकी प्रवृत्ति, प्रवृत्तियों या संस्कारों से रंग लेती है।सत्त्व स्वभाव प्राकृतिक प्रवृत्ति मन और उसकी विशिष्ट प्रवृत्तियां।प्रत्येक प्रत्येक जीवित प्राणी।पुरुष मनुष्य व्यक्तिगत आत्मा जो जन्म-मरण के चक्र में फंसी हुई है, मन से सीमित आत्मा।श्रद्धामयः श्रद्धा से पूर्ण जैसे अन्नमय कोश खाद्य पदार्थों से पूर्ण है, जैसे आनंदमय कोश आनंद से पूर्ण है, वैसे ही अंतःकरण (मन, बुद्धि आदि) श्रद्धा से पूर्ण है।मनुष्य अपनी श्रद्धा से बना होता है जो उसकी श्रद्धा है, वह स्वयं वही है। यह सिद्धांत केवल अध्याय VII, श्लोक 20 और 23, तथा अध्याय IX, श्लोक 25 में प्रतिपादित सिद्धांत की पुनरावृत्ति है।