और जो दान बदले में कुछ पाने की आशा से, या पुरस्कार की प्राशा से, या अनिच्छा से दिया जाता है, वह दान राजसी माना जाता है।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत
17.21 यत् कौन सा? तु निश्चित रूप से? प्रत्युपकारार्थम् बदले में प्राप्त करने की आशा से? फलम् फल? उद्दिश्य देखते हुए? वा या? पुनः फिर से? दीयते दिया जाता है? च और? परिक्लिष्टम् अनिच्छा से? तत् वह? दानम् दान? राजसम् राजसी? स्मृतम् माना जाता है। व्याख्या वह दान या उपहार जो भविष्य में इसे वापस किए जाने की या सार्वजनिक रूप से प्रशंसा किए जाने की आशा में दिया जाता है, या जो किसी अदृश्य पुरस्कार या स्वर्गीय सुख लाएगा, वह भावुक है। यदि कोई व्यक्ति एक ब्राह्मण या संन्यासी को दान देता है इस आशा में कि उसके सभी पाप धुल जाएँगे, तो यह भी राजसी दान है। यदि कोई व्यक्ति दान देने के बाद हृदय से दुःखी है, तो यह भी भावुक प्रकृति का दान है।
आनंद के साथ इस श्लोक पर विचार करें
यह श्लोक आपके भीतर क्या उत्पन्न करता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से ज्ञान लेता है और आपके अपने मार्ग को सम्मान देता है।
17.21 यत् कौन सा? तु निश्चित रूप से? प्रत्युपकारार्थम् बदले में प्राप्त करने की आशा से? फलम् फल? उद्दिश्य देखते हुए? वा या? पुनः फिर से? दीयते दिया जाता है? च और? परिक्लिष्टम् अनिच्छा से? तत् वह? दानम् दान? राजसम् राजसी? स्मृतम् माना जाता है। व्याख्या वह दान या उपहार जो भविष्य में इसे वापस किए जाने की या सार्वजनिक रूप से प्रशंसा किए जाने की आशा में दिया जाता है, या जो किसी अदृश्य पुरस्कार या स्वर्गीय सुख लाएगा, वह भावुक है। यदि कोई व्यक्ति एक ब्राह्मण या संन्यासी को दान देता है इस आशा में कि उसके सभी पाप धुल जाएँगे, तो यह भी राजसी दान है। यदि कोई व्यक्ति दान देने के बाद हृदय से दुःखी है, तो यह भी भावुक प्रकृति का दान है।