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भगवद गीता 16.11

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः | कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ||१६-११||
cintāmaparimeyāṃ ca pralayāntāmupāśritāḥ . kāmopabhogaparamā etāvaditi niścitāḥ ||16-11||
अपरिमित चिंताओं में निमग्न रहते हैं जो केवल मृत्यु तक समाप्त होती हैं, काम की पूर्ति को अपना परम लक्ष्य मानते हैं, और यही सब कुछ है - ऐसा निश्चित रूप से विश्वास करते हैं।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत

16.11 चिन्ताम् चिंताएँ? अपरिमेयाम् अपरिमित? च और? प्रलयान्तम् केवल मृत्यु तक समाप्त? उपाश्रिताः आश्रित? कामोपभोगपरमाः काम की पूर्ति को परम लक्ष्य मानते? एतावत् वह सब है? इति इस प्रकार? निश्चिताः निश्चित रूप से।टिप्पणी वे अपार चिंताओं, चिंतनों और व्यग्रता से ग्रस्त हैं और उनका मन अनगिनत इंद्रिय विषयों को प्राप्त करने और संरक्षित करने में लगा हुआ है। उन्हें दृढ़ विश्वास है कि इंद्रिय सुख ही मनुष्य का परम लक्ष्य है। वे इंद्रियों के विषयों का आनंद लेने में पूरी तरह डूबे हुए हैं। वे दृढ़ता से विश्वास करते हैं कि यही सब कुछ है। वे मानते हैं कि भोग ही सर्वोच्च सुख का स्रोत है और आत्मा का शाश्वत आनंद या आत्म का परमानंद कोई वास्तविक चीज़ नहीं है। उन्हें दूसरे लोक में या परम आनंद में कोई विश्वास नहीं है जो इंद्रिय विषयों से स्वतंत्र है, जो इंद्रियों की पहुँच से परे है। उनकी बुद्धि मंद और स्थूल है, इसलिए वे सूक्ष्म उच्च सत्य को नहीं समझ सकते। भोग उनके लिए प्राप्ति का सबसे बड़ा विषय है।

इस श्लोक पर आनंद के साथ चिंतन करें

यह श्लोक आपमें क्या जगाता है? कोई भी प्रश्न पूछें — आनंद कई परंपराओं से प्रेरणा लेते हैं और आपके अपने मार्ग का सम्मान करते हैं।

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