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भगवद् गीता 15.6

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः | यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ||१५-६||
na tadbhāsayate sūryo na śaśāṅko na pāvakaḥ . yadgatvā na nivartante taddhāma paramaṃ mama ||15-6||
न तो सूर्य वहां प्रकाश डालता है, न चंद्रमा, न अग्नि; वहां जाकर वे लौटते नहीं; वह मेरा परम धाम है।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत

15.6 न नहीं? तत् वह? भासयते प्रकाशित करता है? सूर्यः सूर्य? न नहीं? शशाङ्कः चंद्रमा? न नहीं? पावकः अग्नि? यत् जिसे? गत्वा जाकर? न नहीं? निवर्तन्ते (वे) लौटते हैं? तत् वह? धाम धाम? परमम् परम? मम मेरा।टिप्पणी वह परम धाम आत्मप्रकाश है क्योंकि ब्रह्म स्वयंप्रकाश है। यह सूर्य, चंद्रमा और अग्नि के सृष्टि के दौरान अस्तित्व में आने से पहले अस्तित्व में था। यह विश्व के विलय के दौरान अप्रकट में विलीन होने के बाद भी बना रहता है।यह श्लोक कठोपनिषद से लिया गया है। सूर्य वहां नहीं चमकता, न ही चंद्रमा और तारे, और न ही यह बिजली चमकती है और इस अग्नि की तो बात ही छोड़ें। जब यह चमकता है, तो सब कुछ इसके बाद चमकता है, इसके प्रकाश से, ये सब चमकते हैं (अध्याय II, 5.15)। यही विचार श्वेताश्वतर उपनिषद (6.14) और मुंडक उपनिषद (II.2.10) में आता है। सूर्य, चंद्रमा आदि अपना प्रकाश परब्रह्म से प्राप्त करते हैं। परम सत्ता को प्रकाशित करने के लिए कुछ और नहीं चाहिए क्योंकि यह स्वयंप्रकाश है।धाम परमम् परम धाम या उत्कृष्ट आसन या परब्रह्म।यद्यपि सूर्य सभी को प्रकाशित करने की शक्ति से संपन्न है, फिर भी वह परम सत्ता को प्रकाशित नहीं कर सकता।यत् धाम वैष्णवं पदं गत्वा प्राप्य न निवर्तन्ते यत् च सूर्यादिभिः न भासयते तत् धाम पदं परमं मम विष्णोः।वह धाम, जिसको प्राप्त होकर कोई लौटता नहीं, और जिसे सूर्य, चंद्रमा, तारे, बिजली और अग्नि प्रकाशित नहीं करते, वह विष्णु का सर्वोच्च धाम है।(देखें VIII.21)

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