फिर उस लक्ष्य को खोजा जाना चाहिए जहाँ पहुँचकर कोई फिर लौटता नहीं है। मैं उस आदि पुरुष की शरण लेता हूँ जिससे यह प्राचीन कर्म या शक्ति प्रवाहित हुई है।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द अर्थ उसी स्रोत से हैं। स्रोत
15.4 ततः तब? पदम् लक्ष्य? तत् वह? परिमार्गितव्यम् खोजा जाना चाहिए? यस्मिन् जहाँ? गताः पहुँचकर? न नहीं? निवर्तन्ति लौटते? भूयः फिर? तम् उस? एव ही? च और? आद्यम् आदि? पुरुषम् पुरुष? प्रपद्ये शरण लेता हूँ? यतः जिससे? प्रवृत्तिः कर्म या शक्ति? प्रसृता प्रवाहित? पुराणी प्राचीन।टिप्पणी जो संपूर्ण विश्व को अस्तित्व-ज्ञान-आनंद के रूप में भरता है वह पुरुष है। अथवा जो इस शरीर-पुरी (नगर) में सोता है वह पुरुष है।एकाग्र भक्ति जो परमात्मा का निरंतर चिंतन और ध्यान है, आत्मसाक्षात्कार का निश्चित साधन है। आदि पुरुष में एकमात्र शरण लेना उस परम लक्ष्य को जानने का साधन है जहाँ पहुँचकर ज्ञानी पुनः इस मृत्यु के संसार में नहीं लौटते।साधक को विष्णु के धाम को जानना चाहिए। उसे कठिन प्रयास करके वहाँ तक पहुँचना चाहिए। उसे आदि पुरुष में शरण लेकर इसकी खोज करनी चाहिए। यदि वह विष्णु के अमर धाम या अव्यय ब्रह्म के आसन तक पहुँच जाता है तो वह इस नश्वर संसार में कभी नहीं लौटेगा।आदि पुरुष या शुद्ध परमात्मा जो सत्-चित्-आनंद-निरपेक्ष हैं, वह लक्ष्य या परम आश्रय हैं। जैसे जादूगर की चाल से हाथी, घोड़े आदि मिथ्या पदार्थ प्रकट होते हैं, वैसे ही इस प्राचीन शक्ति या मूल दिव्य शक्ति या इस वृक्ष का उद्भव आदि पुरुष से प्रवाहित हुआ है।कौन से लोग उस अनंत लक्ष्य तक पहुँचते हैं यह सुनो।
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15.4 ततः तब? पदम् लक्ष्य? तत् वह? परिमार्गितव्यम् खोजा जाना चाहिए? यस्मिन् जहाँ? गताः पहुँचकर? न नहीं? निवर्तन्ति लौटते? भूयः फिर? तम् उस? एव ही? च और? आद्यम् आदि? पुरुषम् पुरुष? प्रपद्ये शरण लेता हूँ? यतः जिससे? प्रवृत्तिः कर्म या शक्ति? प्रसृता प्रवाहित? पुराणी प्राचीन।टिप्पणी जो संपूर्ण विश्व को अस्तित्व-ज्ञान-आनंद के रूप में भरता है वह पुरुष है। अथवा जो इस शरीर-पुरी (नगर) में सोता है वह पुरुष है।एकाग्र भक्ति जो परमात्मा का निरंतर चिंतन और ध्यान है, आत्मसाक्षात्कार का निश्चित साधन है। आदि पुरुष में एकमात्र शरण लेना उस परम लक्ष्य को जानने का साधन है जहाँ पहुँचकर ज्ञानी पुनः इस मृत्यु के संसार में नहीं लौटते।साधक को विष्णु के धाम को जानना चाहिए। उसे कठिन प्रयास करके वहाँ तक पहुँचना चाहिए। उसे आदि पुरुष में शरण लेकर इसकी खोज करनी चाहिए। यदि वह विष्णु के अमर धाम या अव्यय ब्रह्म के आसन तक पहुँच जाता है तो वह इस नश्वर संसार में कभी नहीं लौटेगा।आदि पुरुष या शुद्ध परमात्मा जो सत्-चित्-आनंद-निरपेक्ष हैं, वह लक्ष्य या परम आश्रय हैं। जैसे जादूगर की चाल से हाथी, घोड़े आदि मिथ्या पदार्थ प्रकट होते हैं, वैसे ही इस प्राचीन शक्ति या मूल दिव्य शक्ति या इस वृक्ष का उद्भव आदि पुरुष से प्रवाहित हुआ है।कौन से लोग उस अनंत लक्ष्य तक पहुँचते हैं यह सुनो।