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भगवद गीता 14.20

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् | जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ||१४-२०||
guṇānetānatītya trīndehī dehasamudbhavān . janmamṛtyujarāduḥkhairvimukto.amṛtamaśnute ||14-20||
जिस देही ने इन तीनों गुणों को पार कर लिया है जिनसे शरीर की उत्पत्ति हुई है, वह जन्म, मृत्यु, जरा और दुःख से मुक्त हो जाता है और अमरता को प्राप्त करता है।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत

14.20 गुणान् गुण? एतान् ये? अतीत्य पार कर? त्रीन् तीन? देही देही? देहसमुद्भवान् जिनसे शरीर की उत्पत्ति हुई है? जन्ममृत्युजरादुःखैः जन्म? मृत्यु? जरा और दुःख से? विमुक्तः मुक्त? अमृतम् अमरता? अश्नुते प्राप्त करता है।टिप्पणी जैसे एक नदी महासागर में विलीन हो जाती है, वैसे ही जो व्यक्ति जीवित रहते हुए उन गुणों को पार कर गया है जो सभी शरीरों की उत्पत्ति का बीज हैं और जिनसे शरीर बने हैं, वह मुझमें विलीन हो जाता है। वह सदा शाश्वत के आनंद का आनंद लेता है। उसे मुक्ति या मोक्ष की प्राप्ति होती है। उसे मेरे सत्य की प्राप्ति होती है।जब प्रभु ने कहा कि बुद्धिमान व्यक्ति तीनों गुणों को पार कर जाता है और अमरता को प्राप्त करता है, तो अर्जुन को इसके बारे में और जानने की इच्छा हुई। जैसे उसने अध्याय II, श्लोक 54 में स्थिर बुद्धि वाले ऋषि के बारे में प्रश्न पूछा था, वैसे ही वह अब भगवान कृष्ण से तीनों गुणों को पार कर जाने वाले ऋषि की विशेषताओं के बारे में पूछता है। वह कैसे कार्य करता है? उसका आचरण या व्यवहार कैसा है? वह गुणों को कैसे पार कर गया है?

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यह श्लोक आपके अंदर क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से संचरित होता है और आपके अपने पथ को सम्मानित करता है।

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