इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः |
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ||१४-२||
idaṃ jñānamupāśritya mama sādharmyamāgatāḥ .
sarge.api nopajāyante pralaye na vyathanti ca ||14-2||
जिन्होंने इस ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे साथ एकता प्राप्त की है, वे सृष्टि के समय पैदा नहीं होते और प्रलय के समय व्यथित नहीं होते।
English translation: Swami Sivananda (1942) · word meanings below from the same source. Source
14.2 इदम् यह? ज्ञानम् ज्ञान? उपाश्रित्य आश्रय लेकर? मम मेरे? साधर्म्यम् समानता? आगताः प्राप्त किए हैं? सर्गे सृष्टि के समय? अपि भी? न नहीं? उपजायन्ते पैदा होते हैं? प्रलये प्रलय के समय? न नहीं? व्यथन्ति व्यथित होते हैं? च और।व्याख्या इस ज्ञान का आश्रय लेकर वे (ऋषि) मेरे स्वरूप में लीन हो जाते हैं। वे मेरे अस्तित्व को प्राप्त कर चुके हैं। वे मेरे साथ एकाकार हो गए हैं। वे मुझमें रहते हैं, उनमें तुम और मैं का विचार नहीं रहता। वे जन्म और मृत्यु से परे चले जाते हैं। सृष्टि आरंभ होते समय उनका कोई जन्म नहीं होता और प्रलय के समय उनकी कोई मृत्यु नहीं होती। मुझ तक पहुँचकर वे शाश्वतता, अमरता और पूर्णता को प्राप्त कर लेते हैं। आत्मज्ञान की साधना द्वारा आत्मज्ञान को प्राप्त करके, आवश्यक साधनों का अभ्यास करके, वे मेरे साथ एकाकार हो जाते हैं, इसलिए वे सृष्टि के समय पैदा नहीं होते और न ही प्रलय के समय व्यथित होते हैं। इस श्लोक में भगवान ने आत्मज्ञान की प्रशंसा की है।
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14.2 इदम् यह? ज्ञानम् ज्ञान? उपाश्रित्य आश्रय लेकर? मम मेरे? साधर्म्यम् समानता? आगताः प्राप्त किए हैं? सर्गे सृष्टि के समय? अपि भी? न नहीं? उपजायन्ते पैदा होते हैं? प्रलये प्रलय के समय? न नहीं? व्यथन्ति व्यथित होते हैं? च और।व्याख्या इस ज्ञान का आश्रय लेकर वे (ऋषि) मेरे स्वरूप में लीन हो जाते हैं। वे मेरे अस्तित्व को प्राप्त कर चुके हैं। वे मेरे साथ एकाकार हो गए हैं। वे मुझमें रहते हैं, उनमें तुम और मैं का विचार नहीं रहता। वे जन्म और मृत्यु से परे चले जाते हैं। सृष्टि आरंभ होते समय उनका कोई जन्म नहीं होता और प्रलय के समय उनकी कोई मृत्यु नहीं होती। मुझ तक पहुँचकर वे शाश्वतता, अमरता और पूर्णता को प्राप्त कर लेते हैं। आत्मज्ञान की साधना द्वारा आत्मज्ञान को प्राप्त करके, आवश्यक साधनों का अभ्यास करके, वे मेरे साथ एकाकार हो जाते हैं, इसलिए वे सृष्टि के समय पैदा नहीं होते और न ही प्रलय के समय व्यथित होते हैं। इस श्लोक में भगवान ने आत्मज्ञान की प्रशंसा की है।