बेहतर अनुभव के लिए One Source Sangha को इंस्टॉल करें

भगवद् गीता 13.30

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः | यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ||१३-३०||
prakṛtyaiva ca karmāṇi kriyamāṇāni sarvaśaḥ . yaḥ paśyati tathātmānamakartāraṃ sa paśyati ||13-30||
जो देखता है कि सभी कर्म प्रकृति द्वारा अकेले किए जाते हैं और आत्मा निष्क्रिय है, वह सच में देखता है।

अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्दों के अर्थ समान स्रोत से। स्रोत

13.30 प्रकृत्या प्रकृति द्वारा? एव अकेले? च और? कर्माणि कर्म? क्रियमाणानि किए जा रहे? सर्वशः सभी? यः जो? पश्यति देखता है? तथा वैसे ही? आत्मानम् आत्मा? अकर्तारम् निष्क्रिय? सः वह? पश्यति देखता है।व्याख्या प्रकृति सभी गतिविधियों के लिए जिम्मेदार है। आत्मा सभी कर्मों से परे है। यह केवल मूक साक्षी है। जो इस प्रकार अनुभव करता है वह वास्तविक दर्शी या ऋषि है।जो जानता है कि ज्ञान के पाँच इंद्रियों, कर्म की पाँच इंद्रियों, मन और बुद्धि से आने वाले सभी कर्म प्रकृति द्वारा संचालित हैं और आत्मा निष्क्रिय है, वह सच में देखता है। केवल वही देखता है। जो अपने आपको शरीर, मन और इंद्रियों से जोड़ता है और मूर्खतापूर्वक सोचता है कि आत्मा कर्ता है, वह अज्ञानी है। वह केवल शारीरिक आँखों से देखता है। उसके पास अंतर्ज्ञान की आंतरिक दृष्टि नहीं है। आकाश गतिहीन रहता है किंतु बादल आकाश में गतिमान होते हैं। उसी प्रकार आत्मा निष्क्रिय है किंतु प्रकृति सभी कुछ करती है। आत्मा किसी भी सीमित विशेषण से रहित है। जैसे आकाश में कोई विविधता नहीं है, उसी प्रकार आत्मा में भी कोई विविधता नहीं है। यह एक सजातीय सार है। यह किसी भी प्रकार की विशेषताओं से मुक्त है। (cf.III.27XIV.19XVIII.16)

इस श्लोक पर Ananda के साथ विचार करें

यह श्लोक आपके में क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — Ananda कई परंपराओं से खींचता है और आपके अपने मार्ग का सम्मान करता है।

हमारे साथ चलें

एक अंश, एक प्रश्न, हर रविवार। कभी और कुछ नहीं।

🌐 English  ·  हिन्दी