सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् |
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ||१३-१५||
sarvendriyaguṇābhāsaṃ sarvendriyavivarjitam .
asaktaṃ sarvabhṛccaiva nirguṇaṃ guṇabhoktṛ ca ||13-15||
सभी इंद्रियों के कार्यों से प्रकाशित, किंतु इंद्रियों से रहित; असंग, फिर भी सभी को धारण करने वाला; गुणों से रहित, फिर भी गुणों का भोक्ता।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्द अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत
13.15 सर्वेन्द्रियगुणाभासम् सभी इंद्रियों के कार्यों से प्रकाशित? सर्वेन्द्रयविवर्जितम् (फिर भी) इंद्रियों से रहित? असक्तम् असंग? सर्वभृत् (फिर भी) सभी को धारण करने वाला? च और? एव ही? निर्गुणम् गुणों से रहित? गुणभोक्तृ (फिर भी) गुणों का भोक्ता? च और। व्याख्या ब्रह्म आँखों के बिना देखता है? कानों के बिना सुनता है? नाक के बिना सूंघता है? मुँह के बिना खाता है? त्वचा के बिना महसूस करता है? हाथों के बिना पकड़ता है? पैरों के बिना चलता है। वह अदेखा द्रष्टा है? अनुसुना श्रोता है? अचिंतित चिंतक है। उसके अतिरिक्त कोई द्रष्टा नहीं है? कोई श्रोता नहीं है? कोई चिंतक नहीं है। वह आत्मा है? भीतरी शासक है? अमर है। (बृहदारण्यक उपनिषद III.7.23) वह प्रकृति के गुणों से मुक्त है और फिर भी गुणों का भोक्ता है। सभी इंद्रियाँ ज्ञान की पाँच इंद्रियाँ और कर्म की पाँच इंद्रियाँ? अंतरिक इंद्रियाँ? मन और बुद्धि सभी इंद्रियों के अंतर्गत आती हैं। कर्म की इंद्रियाँ और ज्ञान की इंद्रियाँ मन और बुद्धि के संयोजन से अपने कार्य करती हैं। वे स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सकतीं। इसलिए? मन और बुद्धि सभी इंद्रियों के अंतर्गत आती हैं। ब्रह्म पारलौकिक और अप्रकट है? किंतु यह बाहरी और आंतरिक इंद्रियों की सीमित शक्तियों के माध्यम से स्वयं को प्रकट करता है। चूँकि यह इंद्रियों से रहित है? यह असंग है और फिर भी सभी को धारण करता है। यह सब कुछ का आधार या आधारभूत है। यह प्रकृति के गुणों से रहित है और फिर भी उन गुणों का भोक्ता है। ब्रह्म वास्तव में रहस्यमय है। यह श्लोक श्वेताश्वतर उपनिषद 3.17 से लिया गया है।
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13.15 सर्वेन्द्रियगुणाभासम् सभी इंद्रियों के कार्यों से प्रकाशित? सर्वेन्द्रयविवर्जितम् (फिर भी) इंद्रियों से रहित? असक्तम् असंग? सर्वभृत् (फिर भी) सभी को धारण करने वाला? च और? एव ही? निर्गुणम् गुणों से रहित? गुणभोक्तृ (फिर भी) गुणों का भोक्ता? च और। व्याख्या ब्रह्म आँखों के बिना देखता है? कानों के बिना सुनता है? नाक के बिना सूंघता है? मुँह के बिना खाता है? त्वचा के बिना महसूस करता है? हाथों के बिना पकड़ता है? पैरों के बिना चलता है। वह अदेखा द्रष्टा है? अनुसुना श्रोता है? अचिंतित चिंतक है। उसके अतिरिक्त कोई द्रष्टा नहीं है? कोई श्रोता नहीं है? कोई चिंतक नहीं है। वह आत्मा है? भीतरी शासक है? अमर है। (बृहदारण्यक उपनिषद III.7.23) वह प्रकृति के गुणों से मुक्त है और फिर भी गुणों का भोक्ता है। सभी इंद्रियाँ ज्ञान की पाँच इंद्रियाँ और कर्म की पाँच इंद्रियाँ? अंतरिक इंद्रियाँ? मन और बुद्धि सभी इंद्रियों के अंतर्गत आती हैं। कर्म की इंद्रियाँ और ज्ञान की इंद्रियाँ मन और बुद्धि के संयोजन से अपने कार्य करती हैं। वे स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर सकतीं। इसलिए? मन और बुद्धि सभी इंद्रियों के अंतर्गत आती हैं। ब्रह्म पारलौकिक और अप्रकट है? किंतु यह बाहरी और आंतरिक इंद्रियों की सीमित शक्तियों के माध्यम से स्वयं को प्रकट करता है। चूँकि यह इंद्रियों से रहित है? यह असंग है और फिर भी सभी को धारण करता है। यह सब कुछ का आधार या आधारभूत है। यह प्रकृति के गुणों से रहित है और फिर भी उन गुणों का भोक्ता है। ब्रह्म वास्तव में रहस्यमय है। यह श्लोक श्वेताश्वतर उपनिषद 3.17 से लिया गया है।