सर्वत्र हाथ और पैर हैं, सर्वत्र आँखें, सिर और मुख हैं, सर्वत्र कान हैं, वह सभी को आवृत्त करके संसार में विद्यमान है।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्दार्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत
13.14 सर्वतः सर्वत्र? पाणिपादम् हाथ और पैरों से? तत् वह? सर्वतः सर्वत्र? अक्षिशिरोमुखम् आँखें? सिर और मुख? सर्वतः सर्वत्र? श्रुतिमत् कानों से? लोके संसार में? सर्वम् सब कुछ? आवृत्य आवृत्त करके? तिष्ठति विद्यमान है। व्याख्या वह (क्षेत्र ज्ञाता या परब्रह्म) इस संसार में सब कुछ को व्याप्त करता है। वह इस विश्व को स्वयं से भरता और घेरता है। वह सब को आवृत्त करके ब्रह्मांड में विद्यमान है। पिछले श्लोक में कहा गया है कि ब्रह्म जिसे जानना है? वह न तो सत् है और न असत् है। कोई यह सोच सकता है कि यह शून्य या कुछ नहीं है। इस गलतफहमी को दूर करने के लिए? प्रभु इस श्लोक में कहते हैं कि ज्ञेय (जो जानने योग्य है) के सर्वत्र हाथ और पैर हैं आदि। यह मन और इंद्रियों को उनके उचित कार्य करने के लिए निर्देशित करता है। यह केवल सगुण ब्रह्म का प्रकट पहलू है। जैसे रेल चालक इंजन को चलाता है? वैसे ही ज्ञेय या क्षेत्र ज्ञाता शरीर रूपी यंत्र को चलाता है। यह अंतर्यामी है। यह परम आत्मा है। यह इस संसार? शरीर? मन? प्राण शक्ति और इंद्रियों का आधार है। ब्रह्म का अस्तित्व सीमित साधनों अर्थात् शरीर? मन और इंद्रियों के अस्तित्व से सिद्ध होता है? क्योंकि उनकी क्रियाओं के पीछे चैतन्य होना चाहिए। तब आप इसे अस्तित्वहीन कैसे कह सकते हैं? जैसे रस्सी भ्रम से उस पर आरोपित सर्प के गुणों या दोषों से प्रभावित नहीं होती? वैसे ही परब्रह्म (क्षेत्र ज्ञाता) आरोपित संसार? शरीर? इंद्रियों? मन और प्राण शक्ति से प्रभावित नहीं है। केवल एक ही सामान्य चैतन्य है जो नित्य? स्वप्रकाश और सर्वव्यापी है। वह सामान्य चैतन्य ही परब्रह्म है। शरीर? मन? इंद्रियाँ और प्राण शक्ति स्वभाव से निर्जीव हैं। किंतु वे ब्रह्म द्वारा क्रिया के लिए संचालित होती हैं। वे ब्रह्म या क्षेत्र ज्ञाता की मात्र उपस्थिति से कार्य करती हैं। (सीमित साधन भ्रमात्मक हैं।) इसलिए वे चैतन्य की छाया ग्रहण करती हैं? जैसे लोहे का टुकड़ा चुंबक की निकटता में चुंबक की छाया ग्रहण करता है। पूरा विश्व ब्रह्म पर रस्सी पर सर्प की तरह आरोपित है। इसे अध्यारोप कहते हैं। इसे अपवाद (निषेध) की विधि (युक्ति) से नष्ट किया जाता है। यह श्लोक श्वेताश्वतरोपनिषद् 3.16 से लिया गया है।
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13.14 सर्वतः सर्वत्र? पाणिपादम् हाथ और पैरों से? तत् वह? सर्वतः सर्वत्र? अक्षिशिरोमुखम् आँखें? सिर और मुख? सर्वतः सर्वत्र? श्रुतिमत् कानों से? लोके संसार में? सर्वम् सब कुछ? आवृत्य आवृत्त करके? तिष्ठति विद्यमान है। व्याख्या वह (क्षेत्र ज्ञाता या परब्रह्म) इस संसार में सब कुछ को व्याप्त करता है। वह इस विश्व को स्वयं से भरता और घेरता है। वह सब को आवृत्त करके ब्रह्मांड में विद्यमान है। पिछले श्लोक में कहा गया है कि ब्रह्म जिसे जानना है? वह न तो सत् है और न असत् है। कोई यह सोच सकता है कि यह शून्य या कुछ नहीं है। इस गलतफहमी को दूर करने के लिए? प्रभु इस श्लोक में कहते हैं कि ज्ञेय (जो जानने योग्य है) के सर्वत्र हाथ और पैर हैं आदि। यह मन और इंद्रियों को उनके उचित कार्य करने के लिए निर्देशित करता है। यह केवल सगुण ब्रह्म का प्रकट पहलू है। जैसे रेल चालक इंजन को चलाता है? वैसे ही ज्ञेय या क्षेत्र ज्ञाता शरीर रूपी यंत्र को चलाता है। यह अंतर्यामी है। यह परम आत्मा है। यह इस संसार? शरीर? मन? प्राण शक्ति और इंद्रियों का आधार है। ब्रह्म का अस्तित्व सीमित साधनों अर्थात् शरीर? मन और इंद्रियों के अस्तित्व से सिद्ध होता है? क्योंकि उनकी क्रियाओं के पीछे चैतन्य होना चाहिए। तब आप इसे अस्तित्वहीन कैसे कह सकते हैं? जैसे रस्सी भ्रम से उस पर आरोपित सर्प के गुणों या दोषों से प्रभावित नहीं होती? वैसे ही परब्रह्म (क्षेत्र ज्ञाता) आरोपित संसार? शरीर? इंद्रियों? मन और प्राण शक्ति से प्रभावित नहीं है। केवल एक ही सामान्य चैतन्य है जो नित्य? स्वप्रकाश और सर्वव्यापी है। वह सामान्य चैतन्य ही परब्रह्म है। शरीर? मन? इंद्रियाँ और प्राण शक्ति स्वभाव से निर्जीव हैं। किंतु वे ब्रह्म द्वारा क्रिया के लिए संचालित होती हैं। वे ब्रह्म या क्षेत्र ज्ञाता की मात्र उपस्थिति से कार्य करती हैं। (सीमित साधन भ्रमात्मक हैं।) इसलिए वे चैतन्य की छाया ग्रहण करती हैं? जैसे लोहे का टुकड़ा चुंबक की निकटता में चुंबक की छाया ग्रहण करता है। पूरा विश्व ब्रह्म पर रस्सी पर सर्प की तरह आरोपित है। इसे अध्यारोप कहते हैं। इसे अपवाद (निषेध) की विधि (युक्ति) से नष्ट किया जाता है। यह श्लोक श्वेताश्वतरोपनिषद् 3.16 से लिया गया है।