आत्मज्ञान में निरंतरता, सत्य ज्ञान के लक्ष्य का ज्ञान — यह ज्ञान कहा जाता है, और इससे विपरीत जो है वह अज्ञान है।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत
13.12 अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम् आत्मज्ञान में निरंतरता? तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् सत्य ज्ञान के लक्ष्य का ज्ञान? एतत् यह? ज्ञानम् ज्ञान? इति इस प्रकार? प्रोक्तम् कहा गया? अज्ञानम् अज्ञान? यत् जो? अतः इससे? अन्यथा विपरीत। व्याख्या मुक्त ऋषि को आत्म का सतत बोध होता है। वह जानता है कि केवल आत्मज्ञान ही स्थायी है और इस संसार से संबंधित अन्य सभी ज्ञान अज्ञान है। वह जानता है कि आत्मज्ञान तक पहुंचने वाला ज्ञान ही एकमात्र सत्य है। विनम्रता से शुरू होने वाली ये सभी विशेषताएं ज्ञान कहलाती हैं क्योंकि वे ज्ञान के लिए सहायक हैं, ये ज्ञान के साधन हैं। ये ज्ञान के गौण या सहायक कारण हैं। इस आत्मज्ञान का फल जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति है। आध्यात्मिक साधक को हमेशा ज्ञान के लक्ष्य को ध्यान में रखना चाहिए। तभी वह उन विभिन्न गुणों को विकसित करने का प्रयास करेगा जो आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए सहायक हैं। ज्ञान के विपरीत क्या है? अर्थात् काम, क्रोध, लोभ, गर्व, कपट, आसक्ति, चतुराई, कूटनीति, दूसरों को हानि पहुंचाना — ये सभी अज्ञान हैं। ये बुरे लक्षण जो अज्ञान की उपज हैं, मनुष्य को संसार से बाँधते हैं। यदि आप आत्मज्ञान की प्राप्ति करना चाहते हैं तो आपको इन बुरे लक्षणों को दूर करना होगा जो मुक्ति के पथ में बाधा हैं। यदि आप विपरीत गुणों का विकास करेंगे, तो बुरे लक्षण स्वयं ही समाप्त हो जाएंगे जैसे बगीचे में जल से वंचित पौधे स्वयं ही सूख जाते हैं। इन बुरे लक्षणों से लड़कर उन्हें दूर करना कठिन है।
इस श्लोक पर आनंद के साथ विचार करें
यह श्लोक आपके मन में क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से प्रेरणा लेता है और आपके अपने मार्ग का सम्मान करता है।
13.12 अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम् आत्मज्ञान में निरंतरता? तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् सत्य ज्ञान के लक्ष्य का ज्ञान? एतत् यह? ज्ञानम् ज्ञान? इति इस प्रकार? प्रोक्तम् कहा गया? अज्ञानम् अज्ञान? यत् जो? अतः इससे? अन्यथा विपरीत। व्याख्या मुक्त ऋषि को आत्म का सतत बोध होता है। वह जानता है कि केवल आत्मज्ञान ही स्थायी है और इस संसार से संबंधित अन्य सभी ज्ञान अज्ञान है। वह जानता है कि आत्मज्ञान तक पहुंचने वाला ज्ञान ही एकमात्र सत्य है। विनम्रता से शुरू होने वाली ये सभी विशेषताएं ज्ञान कहलाती हैं क्योंकि वे ज्ञान के लिए सहायक हैं, ये ज्ञान के साधन हैं। ये ज्ञान के गौण या सहायक कारण हैं। इस आत्मज्ञान का फल जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति है। आध्यात्मिक साधक को हमेशा ज्ञान के लक्ष्य को ध्यान में रखना चाहिए। तभी वह उन विभिन्न गुणों को विकसित करने का प्रयास करेगा जो आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए सहायक हैं। ज्ञान के विपरीत क्या है? अर्थात् काम, क्रोध, लोभ, गर्व, कपट, आसक्ति, चतुराई, कूटनीति, दूसरों को हानि पहुंचाना — ये सभी अज्ञान हैं। ये बुरे लक्षण जो अज्ञान की उपज हैं, मनुष्य को संसार से बाँधते हैं। यदि आप आत्मज्ञान की प्राप्ति करना चाहते हैं तो आपको इन बुरे लक्षणों को दूर करना होगा जो मुक्ति के पथ में बाधा हैं। यदि आप विपरीत गुणों का विकास करेंगे, तो बुरे लक्षण स्वयं ही समाप्त हो जाएंगे जैसे बगीचे में जल से वंचित पौधे स्वयं ही सूख जाते हैं। इन बुरे लक्षणों से लड़कर उन्हें दूर करना कठिन है।