अर्जुन उवाच |
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च |
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ||१३-१||
arjuna uvāca .
prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva kṣetraṃ kṣetrajñameva ca .
etadveditumicchāmi jñānaṃ jñeyaṃ ca keśava ||13-1||
अर्जुन ने कहा: हे केशव, मैं प्रकृति (पदार्थ) और पुरुष (आत्मा), क्षेत्र और क्षेत्र के ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय को समझना चाहता हूं।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत
13.1 प्रकृतिम् प्रकृति (पदार्थ)? पुरुषम् पुरुष (चेतना या आत्मा)? च और? एव ही? क्षेत्रम् क्षेत्र? क्षेत्रज्ञम् क्षेत्र का ज्ञाता? एव ही? च और? एतत् यह? वेदितुम् जानने के लिए? इच्छामि (मैं) चाहता हूं? ज्ञानम् ज्ञान? ज्ञेयम् जो जाना जाना चाहिए? च और? केशव हे केशव।व्याख्या कुछ पुस्तकों में यह श्लोक नहीं पाया जाता है। यदि इस श्लोक को भी शामिल किया जाए? तो भगवद् गीता के श्लोकों की संख्या 701 हो जाएगी। कुछ टीकाकार इस श्लोक को एक जोड़ मानते हैं।हम गीता के तीसरे खंड के प्रारंभ में आ गए हैं। अनिवार्य रूप से इस खंड में समान ज्ञान सिखाया जाता है लेकिन अधिक विस्तार है।इस क्षेत्र पर प्रवचन का उद्देश्य दोनों प्रकृतियों के स्वामी की आवश्यक प्रकृति को निर्धारित करना है - नीचली और ऊंची? जैसा कि अध्याय VII, श्लोक 4 और 5 में वर्णित है।पिछले प्रवचन में श्लोक 13 से अंत तक उस भक्त का वर्णन दिया गया है जो प्रभु को प्रिय है। अब सवाल उठता है कि उसे सत्य का कौन सा ज्ञान होना चाहिए? इस प्रवचन में इसका उत्तर दिया गया है।प्रकृति तीन गुणों से बनी है। यह व्यक्तिगत आत्मा के दो उद्देश्यों - भोग (भोग) और अपवर्ग (मुक्ति) की पूर्ति के लिए शरीर, इंद्रियों और संवेदी वस्तुओं में रूपांतरित हो जाती है।गीता को तीन खंडों में विभाजित किया गया है जो सामवेद के महावाक्य या महान वाक्य - तत्त्वमसि (तुम वह हो) के तीन शब्दों का उदाहरण देते हैं। इस विचार के अनुसार पहले छह अध्याय कर्म या कर्म योग के मार्ग और तुम (त्वम्पद) की प्रकृति से संबंधित हैं। अगले छह अध्याय भक्ति या भक्ति योग के मार्ग और तत् (तत्पद) की प्रकृति की व्याख्या करते हैं। अंतिम छह अध्याय ज्ञान या ज्ञान योग के मार्ग और मध्य पद अस्ति (असिपद) की प्रकृति से संबंधित हैं जो व्यक्तिगत और सर्वोच्च आत्मा की पहचान (जीव ब्रह्म ऐक्यम्) को स्थापित करता है।अर्जुन अब प्रकृति और पुरुष (पदार्थ और चेतना) के बीच के अंतर को विस्तार से जानना चाहते हैं। वह उनके बीच के अंतर का विवेकपूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं।
इस श्लोक पर आनंद के साथ विचार करें
यह श्लोक आपमें क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से ज्ञान लेता है और आपके अपने मार्ग को सम्मानित करता है।
13.1 प्रकृतिम् प्रकृति (पदार्थ)? पुरुषम् पुरुष (चेतना या आत्मा)? च और? एव ही? क्षेत्रम् क्षेत्र? क्षेत्रज्ञम् क्षेत्र का ज्ञाता? एव ही? च और? एतत् यह? वेदितुम् जानने के लिए? इच्छामि (मैं) चाहता हूं? ज्ञानम् ज्ञान? ज्ञेयम् जो जाना जाना चाहिए? च और? केशव हे केशव।व्याख्या कुछ पुस्तकों में यह श्लोक नहीं पाया जाता है। यदि इस श्लोक को भी शामिल किया जाए? तो भगवद् गीता के श्लोकों की संख्या 701 हो जाएगी। कुछ टीकाकार इस श्लोक को एक जोड़ मानते हैं।हम गीता के तीसरे खंड के प्रारंभ में आ गए हैं। अनिवार्य रूप से इस खंड में समान ज्ञान सिखाया जाता है लेकिन अधिक विस्तार है।इस क्षेत्र पर प्रवचन का उद्देश्य दोनों प्रकृतियों के स्वामी की आवश्यक प्रकृति को निर्धारित करना है - नीचली और ऊंची? जैसा कि अध्याय VII, श्लोक 4 और 5 में वर्णित है।पिछले प्रवचन में श्लोक 13 से अंत तक उस भक्त का वर्णन दिया गया है जो प्रभु को प्रिय है। अब सवाल उठता है कि उसे सत्य का कौन सा ज्ञान होना चाहिए? इस प्रवचन में इसका उत्तर दिया गया है।प्रकृति तीन गुणों से बनी है। यह व्यक्तिगत आत्मा के दो उद्देश्यों - भोग (भोग) और अपवर्ग (मुक्ति) की पूर्ति के लिए शरीर, इंद्रियों और संवेदी वस्तुओं में रूपांतरित हो जाती है।गीता को तीन खंडों में विभाजित किया गया है जो सामवेद के महावाक्य या महान वाक्य - तत्त्वमसि (तुम वह हो) के तीन शब्दों का उदाहरण देते हैं। इस विचार के अनुसार पहले छह अध्याय कर्म या कर्म योग के मार्ग और तुम (त्वम्पद) की प्रकृति से संबंधित हैं। अगले छह अध्याय भक्ति या भक्ति योग के मार्ग और तत् (तत्पद) की प्रकृति की व्याख्या करते हैं। अंतिम छह अध्याय ज्ञान या ज्ञान योग के मार्ग और मध्य पद अस्ति (असिपद) की प्रकृति से संबंधित हैं जो व्यक्तिगत और सर्वोच्च आत्मा की पहचान (जीव ब्रह्म ऐक्यम्) को स्थापित करता है।अर्जुन अब प्रकृति और पुरुष (पदार्थ और चेतना) के बीच के अंतर को विस्तार से जानना चाहते हैं। वह उनके बीच के अंतर का विवेकपूर्ण ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं।