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भगवद् गीता 12.15

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः | हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ||१२-१५||
yasmānnodvijate loko lokānnodvijate ca yaḥ . harṣāmarṣabhayodvegairmukto yaḥ sa ca me priyaḥ ||12-15||
वह जिससे दुनिया व्यथित नहीं होती और जो दुनिया से व्यथित नहीं होता, और जो आनंद, क्रोध, भय और चिंता से मुक्त है — वह मुझे प्रिय है।

अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे दिए गए शब्दों के अर्थ एक ही स्रोत से हैं। स्रोत

12.15 यस्मात् किससे? न नहीं? उद्विजते व्यथित होता है? लोकः दुनिया? लोकात् दुनिया से? न नहीं? उद्विजते व्यथित होता है? च और? यः जो? हर्षामर्षभयोद्वेगैः आनंद, क्रोध, भय और चिंता से? मुक्तः मुक्त? यः जो? सः वह? च और? मे मुझे? प्रियः प्रिय है।टिप्पणी हर्ष आनंद? इच्छा की वस्तु प्राप्त करने पर मन का उल्लास। यह रोमांच, आँसू बहना आदि से प्रकट होता है।अमर्ष क्रोध। कुछ कहते हैं कि यह ईष्या और क्रोध का मिश्रण है।उद्वेग चिंता, व्यग्रता, दुःख, विचलन।ब्रह्मज्ञानी या भगवान के भक्त कभी किसी प्राणी को विचार, वचन और कर्म से नुकसान नहीं पहुँचाते। वे सभी प्राणियों को जीवन की सुरक्षा देते हैं। इसलिए कोई प्राणी उससे भयभीत नहीं होता। ऋषि महसूस करता है कि दुनिया उसका शरीर है, उसका अपना आत्मन है। फिर वह दुनिया से कैसे भयभीत हो सकता है। वह दूसरों को चोट नहीं पहुँचाता और दूसरों के वचन या कर्मों से चोट नहीं खाता।आनंद, ईष्या, भय और चिंता के मानसिक परिवर्तन ऋषि या भगवान के भक्त को अपने आप छोड़ देते हैं, जैसे पशु और पक्षी जंगल को आग लगने पर छोड़ देते हैं।ऐसा ऋषि या भक्त मुझे प्रिय है। मैं उसका वर्णन कैसे कर सकता हूँ

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यह श्लोक आपमें क्या जागृत करता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से निकालता है और आपके अपने पथ का सम्मान करता है।

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