जो मेरे लिए सभी कार्य करता है, जो मुझे परमात्मा मानता है, जो मेरा भक्त है, जो आसक्ति से मुक्त है, जो किसी प्राणी से शत्रुता नहीं रखता है, वह मेरे पास आता है, हे अर्जुन।
अंग्रेजी अनुवाद: स्वामी शिवानंद (1942) · नीचे शब्द अर्थ उसी स्रोत से। स्रोत
11.55 मत्कर्मकृत् मेरे लिए कार्य करता है? मत्परमः मुझे परम मानता है? मद्भक्तः मेरा भक्त है? सङ्गवर्जितः आसक्ति से मुक्त है? निर्वैरः शत्रुता रहित? सर्वभूतेषु सभी प्राणियों के प्रति? यः जो? सः वह? माम् मेरे पास? एति आता है? पाण्डव हे अर्जुन।टिप्पणी यह सम्पूर्ण गीता की शिक्षा का सार है। जो इस शिक्षा का पालन करता है वह परम आनंद और अमरता को प्राप्त करता है। यह श्लोक गीता के संपूर्ण दर्शन का सारांश है।जो कर्तव्यों का पालन प्रभु के लिए करता है? जो अपने सभी कार्यों को उन्हें समर्पित करता है? जो अपने हृदय और आत्मा से प्रभु की सेवा करता है? जो प्रभु को अपना परम लक्ष्य मानता है? जो केवल उसके लिए जीता है? जो केवल उसके लिए काम करता है? जो प्रभु को सभी में देखता है? जो पूरे विश्व को प्रभु के ब्रह्मांडीय रूप के रूप में देखता है और इसलिए किसी भी प्राणी के प्रति शत्रुता की भावना नहीं रखता है भले ही दूसरों ने उसे बहुत हानि पहुँचाई हो? जिसे धन, बच्चों, पत्नी, मित्रों और रिश्तेदारों से कोई लगाव या प्रेम नहीं है? और जो प्रभु को छोड़कर कुछ और नहीं चाहता है? वह उसका साक्षात्कार करता है और उसके अस्तित्व में प्रवेश करता है। वह उसके साथ एक हो जाता है।इस प्रकार उपनिषदों में, प्रतिष्ठित भगवद् गीता में, शाश्वत का विज्ञान, योग का ग्रंथ, श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद में, एकादश प्रवचन का समापन होता है जिसका शीर्षक हैब्रह्मांडीय रूप के दर्शन की योग।
इस श्लोक पर आनंद के साथ विचार करें
यह श्लोक आपके हृदय में क्या जगाता है? कुछ भी पूछें — आनंद कई परंपराओं से ज्ञान लेता है और आपके अपने पथ को सम्मान देता है।
11.55 मत्कर्मकृत् मेरे लिए कार्य करता है? मत्परमः मुझे परम मानता है? मद्भक्तः मेरा भक्त है? सङ्गवर्जितः आसक्ति से मुक्त है? निर्वैरः शत्रुता रहित? सर्वभूतेषु सभी प्राणियों के प्रति? यः जो? सः वह? माम् मेरे पास? एति आता है? पाण्डव हे अर्जुन।टिप्पणी यह सम्पूर्ण गीता की शिक्षा का सार है। जो इस शिक्षा का पालन करता है वह परम आनंद और अमरता को प्राप्त करता है। यह श्लोक गीता के संपूर्ण दर्शन का सारांश है।जो कर्तव्यों का पालन प्रभु के लिए करता है? जो अपने सभी कार्यों को उन्हें समर्पित करता है? जो अपने हृदय और आत्मा से प्रभु की सेवा करता है? जो प्रभु को अपना परम लक्ष्य मानता है? जो केवल उसके लिए जीता है? जो केवल उसके लिए काम करता है? जो प्रभु को सभी में देखता है? जो पूरे विश्व को प्रभु के ब्रह्मांडीय रूप के रूप में देखता है और इसलिए किसी भी प्राणी के प्रति शत्रुता की भावना नहीं रखता है भले ही दूसरों ने उसे बहुत हानि पहुँचाई हो? जिसे धन, बच्चों, पत्नी, मित्रों और रिश्तेदारों से कोई लगाव या प्रेम नहीं है? और जो प्रभु को छोड़कर कुछ और नहीं चाहता है? वह उसका साक्षात्कार करता है और उसके अस्तित्व में प्रवेश करता है। वह उसके साथ एक हो जाता है।इस प्रकार उपनिषदों में, प्रतिष्ठित भगवद् गीता में, शाश्वत का विज्ञान, योग का ग्रंथ, श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच संवाद में, एकादश प्रवचन का समापन होता है जिसका शीर्षक हैब्रह्मांडीय रूप के दर्शन की योग।